मेरा अपना इसमें कुछ भी नहीं .........
जो भी कुछ यहाँ लिखा है जिनेन्द्र देव और जैन तीर्थंकरों की वाणी है !
जैन साधुओं व साध्वियों के प्रवचन हैं !!
सभी को इसे Copy/Share करने की स्वतंत्रता है !
कोई कापीराइट नहीं ..........
Monday, 5 November 2012
Sunday, 4 November 2012
निज व्यथा
जिससे भी हम अपने मन की व्यथा कहेंगें ,दुःख - दर्द कहेंगें ,वह या तो राग-द्वेष व अज्ञानता वश हमारा ही दोष बताकर हमें और दुखी कर देगा या फिर दीन ,हीन ,मुसीबत का मारा समझकर दया दृष्टि से देखेगा ! हमारी और हमारे परिवार की कमजोरियों को यहाँ वहाँ कहकर बदनामी भी कर सकता है और हमारी कमजोरियों का गलत फायदा भी उठा सकता है !
Saturday, 3 November 2012
कृतत्वशील व अकृतत्व
महर्षि वशिष्ठ ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को जल –कमल-जीवन का मन्त्र देते हुए कहा था “बाहर में सदा सक्रिय एवं कृतत्वशील रहकर भी भीतर में अकृतत्व का अनुभव करते रहो ! यही जीवन जीने की श्रेष्ठ कला है !”
एक बार छत्रपति शिवाजी एक दुर्ग का निर्माण कार्य करवा रहे थे ! समर्थ गुरु रामदास जी ,जिनके चरणों में सम्पूर्ण राज्य समर्पित कर छत्रपति संरक्षक के रूप में वहाँ सेवा कर रहे थे ,सहसा वहाँ से गुजरे !
गुरु चरणों में विनयावत हो छत्रपति ने दुर्ग का निरीक्षण करने की प्रार्थना की ! धनाधन निर्माण कार्य चल रहा था ! रामदास ने पूछा –छत्रपति ! यह क्या करवा रहे हो !
छत्रपति ने कहा –“गुरुदेव ,बस यूँ ही ! इस बार अकाल की काली छाया से सम्पूर्ण प्रांत संत्रस्त हो रहा था ,लोगों को न रोटी मिल रही थी ,न रोजी ! तो कुछ प्रबंध कर दिया है ! हजारों लोगों का पेट भर रहा है ,सैंकडों माताएं अपने आँचल से लिपटे दूधमुहों का पोषण कर रही हैं”!
“शिवा की वाणी में कृतत्व का अहं दीप्त हो रहा है ,इसे जैसे लग रहा है कि सम्पूर्ण सृष्टि का यंत्र उसी के हाथों से संचालित हो रहा है” गुरु की अन्तर भेदी दृष्टि ने शिवा के अन्तर में झाँका और इशारा किया –शिवा ! जरा देखो ! वह पत्थर यहाँ क्यों पड़ा है !
यूहीं दुर्ग की दीवार में कहीं चिना जाने को ....शिवा ने कहा !
“अच्छा इसे तोडो” .........गुरु की आज्ञा पाकर के पत्थर को तोडा गया ! उसके बीच से पानी का एक छोटा सा कुण्ड निकला ,जिससे फुदककर एक मेंढक बाहर आकर गिरा !
शिवाजी इस घटना को गंभीरता से देख रहे थे ! गुरु ने गंभीर दृष्टि से शिवा को देखा –शिवा ! इस मेंढक के जल एवं भोजन का प्रबंध भी तुमने किया होगा ! गुरु के प्रश्न की सहज तीक्षनता ने शिवा के अन्तर अहं को बींध डाला !भीतर ही भीतर अहं यों चूर हो गया जैसे कोई मिट्टी के ढेले पर पत्थर की गहरी चोट पड़ी हो !शिवाजी गुरु चरणों में झुक गये !
“शिवा ! मनुष्य अज्ञान की आंधी में भटक कर सोचता है इस पृथ्वी का संचालक मै ही हूँ ,मेरे ही चरणों की आहट से ये पृथ्वी की धडकन चल रही है !” गुरु की ज्ञान गरिमा मयी वाणी मुखरित हो उठी !
Friday, 2 November 2012
करवा चौथ की हार्दिक शुभ कामनाएं
करवा चौथ हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। यह मुख्यत: भारत के पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, और राजस्थान का पर्व है। यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। यह पर्व सौभाग्यवती(सुहागिन) स्त्रियाँ मनाती हैं। यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले करीब 5 बजे के बाद शुरू होकर रात में चंद्रमा दर्शन के बाद संपूर्ण होता है।
ग्रामीण स्त्रियों से लेकर आधुनिक महिलाओं तक सभी नारियाँ करवाचौथ का व्रत बडी़ श्रद्धा एवं उत्साह के साथ रखती हैं। शास्त्रों के अनुसार यह व्रत कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी के दिन करना चाहिए। पति की दीर्घायु एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इस दिन भालचन्द्र गणेश जी की अर्चना की जाती है। करवाचौथ में भी संकष्टीगणेश चतुर्थी की तरह दिन भर उपवास रखकर रात में चन्द्रमा को अर्घ देने के उपरांत ही भोजन करने का विधान है। वर्तमान समय में करवाचौथ व्रतोत्सव ज्यादातर महिलाएं अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार ही मनाती हैं लेकिन अधिकतर स्त्रियां निराहार रहकर चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करती हैं।
सभी बहनों को करवा चौथ की हार्दिक शुभ कामनाएं
Subscribe to:
Posts (Atom)




