मेरा अपना इसमें कुछ भी नहीं .........

जो भी कुछ यहाँ लिखा है जिनेन्द्र देव और जैन तीर्थंकरों की वाणी है !

जैन साधुओं व साध्वियों के प्रवचन हैं !!

सभी को इसे Copy/Share करने की स्वतंत्रता है !

कोई कापीराइट नहीं ..........

Saturday, 26 November 2011

आज का विचार 26.11.2011


आज का विचार 26.11.2011
दस हजार गुजरे हुए कल एक आज
की बराबरी नही कर सकते !
आर्यिका 105 माता स्वस्ति भुषण जी की
“एक लाख की एक एक बात “ से
सभी मुनि,आर्यिकाओं ,साधु,साध्वियों,श्रावक,श्राविकाओं
को यथोचित नमोस्तु,वन्दामी,मथे वन्दना ,जय जिनेन्द्र,नमस्कार
शुभ प्रात:

Friday, 25 November 2011

संगत कीजे साधू की –भाग 2


                                                    संगत कीजे साधू की –भाग 2
     एक आदमी साधुजनों के पास जाता है ,सज्जन पुरुषों के समीप रहता है तो उसके जीवन में सज्जनता विकसित होती है और दूसरा व्यक्ति व्यसनी और व्यभिचारी के साथ रहता है तो उसके अंदर व्यसन और व्यभिचार के प्रति आकर्षण उत्पन्न हुए बिना नही रह सकता ! व्यसन और व्यभिचार से अपने आप को बचाने की कोशिश करो ! जैसे लोगों के संसर्ग में रहते हैं ,वैसे ही गुण व दोष बन जाते हैं !
     इसिलिये संत आचार्य कहते हैं ,बुरी संगत से बचो !हो सकता है तुम्हारे अंदर बुराई न हो लेकिन वैसे लोगों के बीच रहना भी एक बुराई है ! एक आदमी शराब नही पीता ,पर शराब की दूकान पर बैठेगा तो दुनिया उसे शराबी कहने से थोड़े ही चुकेगी !
    बद की सोहबत में मत बैठो ,बद का है अंजाम बुरा !
    बद न बनो पर बद कहलाओ ,बद अच्छा बदनाम बुरा !
      हम बद और बदनाम दोनों से बचें ! बद के साथ यदि रहेंगे तो अपने आपको बदनामी से कभी बचा नही सकते ! इसीलिये बदनामी से बचना चाह्ते हों तो बद से बचो और अपने जीवन के विकास का मार्ग चुनो ! भले व्यक्तियों के साथ रहो ! जिस धुल को आप पैरों तले रोंदते हैं वही  धुल जब संत के चरण से लग जाती है तो वह हमारे मस्तक तक पहुँच जाती है , जिसका कोई मूल्य नही वह हमारे माथे तक पहुँच जाती है ,यह संगति का असर है  !
       मुनि श्री 108 प्रमाण सागर जी की ‘दिव्य जीवन का द्वार’ से 


संगत कीजे साधू की भाग - 1


              संगत कीजे साधू की   भाग - 1
      लुकमान हकीम अंतिम साँसे गिन रहे थे ,उन्होंने इशारा किया,उनका आशय समझकर उनका बेटा धूपदान में से एक मुठठी चन्दन का चूरा  ले आया ! उसके बाद लुकमान ने दूसरा इशारा किया ,बेटा उसे समझते हुए चूल्हे में से कोयला ले आया ! लुकमान ने कहा दोनों को फेंक दो ! दोनों हाथो को खाली करने को कहा ! उसने कहा –अब अपने हाथों को गौर से देखो ,बताओ इनमे क्या है !बेटा कुछ समझा नही बोला दोनों हाथ तो खाली  हैं ,तो लुकमान ने कहा दोनों हाथ खाली नही है ,तुम अपने दोनों हाथो को गौर से देखो ! उसने गौर से देखा तो उसे लगा कि जिस हाथ में चन्दन का चूरा था वह अभी भी सुगंध बिखेर रहा था और जिस हाथ में कोयला रखा गया था उस हाथ में अभी भी कालिख नजर आ रही थी ! लुकमान ने रहस्य समझाते हुए कहा कि बेटा मेरी तुम्हारे लिये यही अंतिम शिक्षा है ,दुनिया में दो तरह के लोग हैं ,कुछ ऐसे हैं जो चन्दन की तरह सुरभि फैलाते हैं ,चन्दन का चूर्ण अभी भी तुम्हारे हाथ में सुगंध दे रहा है ,जबकि अब चन्दन नही है !कोयले का टुकड़ा तुमने हाथ में रखा था ,तब भी काला था और हाथ से फेंक देने के बाद भी हाथ काला है !,दुनिया में कुछ ऐसे हैं जिनके साथ जब तक रहो तब तक हमारा जीवन महकता है ,उनका साथ छूट जाने पर भी वह महक हमारे जीवन में बनी रहती है ,कुछ लोग ऐसे होते हैं ,जिनके साथ रहने से भी जीवन बिगड़ता है ,और छूटने के बाद भी बिगडा रहता है !
       मनुष्य की मति अपने से हीन व्यक्तियों के संसर्ग से हीन हो जाती है ,समान लोगों के संसर्ग में रहने पर समानता रहती है ,पर अपने से गुणवान व्यक्ति के संसर्ग में रहने से हमारी गुणवत्ता बढती है ,हमारे जीवन में विशिष्टता आती है !
     जहाँ सुमति है ,वहां संपत्ति है !जहाँ कुमति है ,वहां विपत्ति है !
        मुनि श्री 108 प्रमाण सागर जी की ‘दिव्य जीवन का द्वार’ से 

आज का विचार 25.11.2011


आज का विचार 25.11.2011
ऐसी घडी आज तक नही बनी जो गुजरे हुए घंटे
को बजा  दे ,इसीलिए हर पल का उपयोग करो !
आर्यिका 105 माता स्वस्ति भुषण जी की
“एक लाख की एक एक बात “ से
सभी मुनि,आर्यिकाओं ,साधु,साध्वियों,श्रावक,श्राविकाओं
को यथोचित नमोस्तु,वन्दामी,मथे वन्दना ,जय जिनेन्द्र,नमस्कार
शुभ प्रात:

Thursday, 24 November 2011

आज का विचार 24.11.2011


आज का विचार 24.11.2011
किसी झूठ से यदि किसी की जान बचती है अथवा
दो व्यक्तियों के बीच मित्रता हो जाये  तो वह भी
सच के बराबर है !
आर्यिका 105 माता स्वस्ति भुषण जी की
“एक लाख की एक एक बात “ से
सभी मुनि,आर्यिकाओं ,साधु,साध्वियों,श्रावक,श्राविकाओं
को यथोचित नमोस्तु,वन्दामी,मथे वन्दना ,जय जिनेन्द्र,नमस्कार
शुभ प्रात:

Wednesday, 23 November 2011

जरा सोचिये

हर बात को गहराई से सोचना चाहिये !
शब्दावली की यथार्थता  पर ध्यान देना 
चाहिये !शब्द के यथार्थ को पकडे बिना 
गलत अनुमान कर लेने से बड़ा अनर्थ 
हो सकता है !

धन की परवाह न करते हुए इंसान को 
कदम कदम पर इज्जत का ख्याल 
रखना चाहिये ! धन को हाथ का मैल
समझते हुए जो इज्जत एवं वचन की 
सुरक्षा करता है ,वही  मानव महान
होता है !

संयम की साधना वही व्यक्ति कर सकता है ,
जिसके  मन में आंतरिक वैराग्य है ,जिसने
अपना मन मार लिया है !

संसार में सम्पूर्ण सुख की उपलब्धि होना बड़ा कठिन है !
दो सुख मिलते हैं ,एक चला जाता है एक मिलता है ,
तो दो चले जाते हैं ! इस तरह का क्रम चलता रहता है !
अत: संसार को विनश्वर मान कर आत्मिक सुखो के प्रति
 प्रयत्न शील रहना चाहिये !

मित्रता

मित्रता में .जब एक का व्यवहार रुक्षता आ
जाती है ,तब दुसरे के व्यव्हार में स्निग्धता
का सवाल ही कहाँ रहता है !पारस्परिक मित्रता 
तभी टिक सकती है ,जबकि व्यव्हार में 
संतुलन रखा जाये ! एक हाथ से ताली नही
बजती !