मेरा अपना इसमें कुछ भी नहीं .........

जो भी कुछ यहाँ लिखा है जिनेन्द्र देव और जैन तीर्थंकरों की वाणी है !

जैन साधुओं व साध्वियों के प्रवचन हैं !!

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कोई कापीराइट नहीं ..........

Saturday, 5 November 2011

आज का विचार 05.11.2011

आज का विचार 05.11.2011
संपत्ति है ,प्रतिष्ठा है ,सफलता हर
कदम पर है !पर प्रेम,मैत्री संवेदना नहीं ,तो
वह सफल है पर सरस नही !
आर्यिका 105 माता स्वस्ति भुषण जी की
“एक लाख की एक एक बात “ से
सभी मुनि,आर्यिकाओं ,साधु,साध्वियों,श्रावक,श्राविकाओं
को यथोचित नमोस्तु,वन्दामी,मथे वन्दना ,जय जिनेन्द्र,नमस्कार
शुभ प्रात:     
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Friday, 4 November 2011

आभामंडल का रंग –वैज्ञानिक दृष्टिकोण


                 आभामंडल का रंग –वैज्ञानिक दृष्टिकोण
          विभिन्न महापुरुषों के चित्रों में उनके सिर के पीछे प्रकाश रूप आकृति को निर्मित किया जाता है ! आध्यात्मिक जगत में इसे आभामंडल कहते हैं! यह कोई पुरातन रीति या पौराणिक कथा नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक सत्य है ! जिसे वर्तमान में प्रमाणों से सिद्ध किया गया है ! यह आभामंडल जिसे वैज्ञानिकों ने ‘औरा’(aura)नाम दिया है ,सभी व्यक्तियों के विद्यमान रहता है !जैन दर्शन में इसे तेजस शारीर कहा है जो प्रत्येक जीव  के साथ विभिन्न अवस्था में विद्यमान रहता है ! इस सन्दर्भ में हॉवर्ड एडल मेन एवं वाल्टर जान किल्नेर की खोजे महत्वपूर्ण हैं ,इन वैज्ञानिकों इस औरा को देखने के लिये विभिन्न प्रकार के यंत्रों की भी खोज की है !
        भोतिक विज्ञान  में इस तेजस शारीर (औरा)की भिन्नता उसमे पाए जाने वाले रंग के आधार पर की गई है जिस प्रकार हर व्यक्ति के चेहरे की बनावट में भिन्नता होती है उँगलियों के ,पैरों की लकीरें भी किसी की किसी से नहीं मिलती ,उसी प्रकार आभामंडल के रंगों की गहराई हल्कापन आदि की भिन्नता रहती है !
आभामंडल रंग व्यक्ति की मनोवृतियों का ज्ञान कराता है ,प्रयोगों में निष्कर्ष निकलता है कि औरा किकी कालिमा आसन्न मृत्यु का सूचक है !
          ध्यान चिंतन एवं तप साधना साधना से आपूरित आतम दृष्टाओं ने इन र्रंग संवेदनाओं को और चित्रवृति की संवेदनात्मक प्रतिक्रियाओं को वर्ण के आधार पर छ: भागों में विभाजित किया गया है ! जिन्हें आध्यात्मिक भाषा में ‘षटलेश्या’
के नाम से जाना जाता है ! जैन आचार्यों ने इसकी एक पूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया पूर्व में ही उपदिष्ट की है ,जिसे वर्तमान में समझने की आवश्यकता है !
         यह लेश्या प्रकरण हमारे समक्ष हमारी मनोवृतियों का एक इतिवृत प्रस्तुत करते हुए उसमे पायी जाने वाली दूषित वृतियों के परिमाजनार्थ एवं आत्मिक विकास की प्रगति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है !
         आचार्य पुष्पदंत सागर जी की “परिणामों का खेल” से

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आज का विचार 04.11.2011

आज का विचार 04.11.2011
स्वाद पर विजय स्व पर विजय पाने
का बहुत बड़ा निमित्त है !
आर्यिका 105 माता स्वस्ति भुषण जी की
“एक लाख की एक एक बात “ से
सभी मुनि,आर्यिकाओं ,साधु,साध्वियों,श्रावक,श्राविकाओं
को यथोचित नमोस्तु,वन्दामी,मथे वन्दना ,जय जिनेन्द्र,नमस्कार
शुभ प्रात:     
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Thursday, 3 November 2011

आज का विचार 03.11.2011


आज का विचार 03.11.2011
अपने से हीन तथा निकृष्ट व्यक्ति के संग से
बुद्धि ,भावना और संस्कारों में हीनता आ
जाती है !
आर्यिका 105 माता स्वस्ति भुषण जी की
“एक लाख की एक एक बात “ से
सभी मुनि,आर्यिकाओं ,साधु,साध्वियों,श्रावक,श्राविकाओं
को यथोचित नमोस्तु,वन्दामी,मथे वन्दना ,जय जिनेन्द्र,नमस्कार
शुभ प्रात:     
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Wednesday, 2 November 2011

लेश्या -भाव व द्रव्य लेश्या

       जब तक चित्त में ,मन के अंतर्मन में किसी भी कोने में ,किसी भी
प्रकार के संकल्प विकल्प हें ,तब तक आत्मा को अशुद्ध माना है ,सागर सुशान्त –नितान्त स्तब्ध हो जाता है –उसमे किसी भी प्रकार की कोई लहरें नहीं उठती ,तभी उसमे स्व ‘आतम बिम्ब प्रकट होता है आत्मदर्शन की प्राप्ति होती है ! समस्त विकल्पों के ,भावों के लुप्त होने पर ही ,आत्म ज्ञान .आत्मज्योति के दर्शन संभव होते हें!
      वही आत्मा परम शुद्ध होती है ,जहाँ चित्त निर्विकल्प होता है ,पता नहीं हमारे चित्त में निरंतर कैसे कैसे भाव उठते रहते हें !हमारा चित्त विचारों की सूक्ष्म तरंगों से घिरा हुआ है ! कौन सी लेश्या इसे कब और कैसे बांधती है ,यही हो हमें समझना है !
      अभी हमारा चित्त बंधा हुआ है ,घिरा हुआ है ! आत्मा में उठने वाले संकल्प विकल्प रुपी जो सूक्ष्म भाव हें,भगवान महावीर स्वामी ने उन्हें अपनी देशना के अंतर्गत लेश्या कहा है
      लेश्या के दो भेद कहे हैं ! भाव लेश्या व द्रव्य लेश्या !द्रव्य लेश्या ऊपर से देखने में आती है ! आपके रंग को देखकर इसका पता चल जाता है ,पूर्ण बोध हो जाता है !यह जीवन पर्यंत बना रहता है !भाव लेश्या मन में होती है यह अंतर्मुख में असंख्यात बार बदलती जाती है !
आचर्य पुष्पदंत सागर की “कर्मो का खेल” से 

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आज का विचार 02.11.2011


आज का विचार 02.11.2011
जीवन में सुख मिलना तो पुण्य
के आधीन है ,लेकिन सुख देना
गुणों के आधीन है
आर्यिका 105 माता स्वस्ति भुषण जी की
“एक लाख की एक एक बात “ से
सभी मुनि,आर्यिकाओं ,साधु,साध्वियों,श्रावक,श्राविकाओं
को यथोचित नमोस्तु,वन्दामी,मथे वन्दना ,जय जिनेन्द्र,नमस्कार
शुभ प्रात:     
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Tuesday, 1 November 2011

आज का विचार 01.11.2011

आज का विचार 01.11.2011
यदि हमने ये सोचा है कि दुनिया
स्वार्थी है तो फिर हम कभी दूसरों
को सुख नहीं दे सकते !
आर्यिका 105 माता स्वस्ति भुषण जी की
“एक लाख की एक एक बात “ से
सभी मुनि,आर्यिकाओं ,साधु,साध्वियों,श्रावक,श्राविकाओं
को यथोचित नमोस्तु,वन्दामी,मथे वन्दना ,जय जिनेन्द्र,नमस्कार
शुभ प्रात: