मेरा अपना इसमें कुछ भी नहीं .........

जो भी कुछ यहाँ लिखा है जिनेन्द्र देव और जैन तीर्थंकरों की वाणी है !

जैन साधुओं व साध्वियों के प्रवचन हैं !!

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Wednesday, 4 January 2012

भारतीय नारी


     भारतीय परम्परा मे नारी को बहुत सम्मान दिया गया है ! यह सत्य है कि एक जमाने मे नारी को बहुत कोसा गया , लेकिन जब हम भारतीय संस्कृति के इतिहास पर विचार करते हैं तो हमें देखने को मिलता है कि जो सम्मान नारी को भारत मे दिया गया है वह अन्यत्र कहीं नही दिया गया ,क्योंकि वह नारी नही ,वह नर को जन्म देने वाली भी है ! नारी न हो तो नर का जन्म नही हो सकता !वह तीर्थंकर भगवंतों जैसे श्रेष्ठ पुरुषों को जन्म देती है !पुरुषों के पास वह पात्रता नही है कि वह किसी को जन्म दे सकें ,लेकिन नारी को यह प्रकृति का वरदान मिला है !

    यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ! शोच्यनते तु यत्रैता विनस्त्यासु हि तत् कुलम !

   जहाँ नारियों कि पूजा होती है ,उस कुल मे देवता करते हैं और जिस कुल मे नारी शोकमग्न होती है वह कुल विनष्ट हो जाता है ,उस कुल का सर्वनाश हो जाता है ! इससे बड़ा गुणगान और कहाँ होगा ?लेकिन यह हर किसी के लिए नही कहा गया है ,यह उसके लिए कहा गया है ,जो नारी निर्दोष हो ,जो नारी गुणवान हो ,जिसके जीवन मे आदर्श हों ,ये सारे विशेषण उसी पर लागू होते हैं

   जैन परम्परा मे तो नारी को बहुत अधिक सम्मान दिया गया है ,हमारे तीर्थंकरों ने नारी को अपने सम्वशरण मे भी स्थान दिया है ,उन्हें शिक्षित दीक्षित किया और उनके जीवन के उत्थान और उत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त किया ! राजा ऋषभदेव ने जो अंक और अक्षर विद्या दी ,वो पहले अपनी पुत्रियों ब्राह्मी व सुंदरी को दी ,भारत व बाहुबली को नही दी ! पहले शिक्षा नारी को दी गयी क्योंकि नारी की शिक्षा ,नारी के संस्कार से  घर मे मे बहुत कुछ परिवर्तन आ सकता है !

मुनिश्री प्रमाण सागर जी “दिव्य जीवन का द्वार “ मे

सभी मुनि,आर्यिकाओं ,साधु,साध्वियों,श्रावक,श्राविकाओं
को यथोचित नमोस्तु ,वन्दामि , मत्थेण वन्दामि ,जय जिनेन्द्र,नमस्कार

शुभ प्रात:

Tuesday, 3 January 2012

आज का विचार 03.01.2012



भोजन के त्याग के साथ ही क्रोध आदि
कषायों का त्याग ही सच्चा उपवास है!

आर्यिका 105 माता स्वस्ति भुषण जी की
 “एक लाख की एक एक बात “ से सभी मुनि,आर्यिकाओं ,साधु,साध्वियों,श्रावक,श्राविकाओं
को यथोचित नमोस्तु
,वन्दामि , मत्थेण वन्दामि ,जय जिनेन्द्र,नमस्कार

शुभ प्रात:

"तुम" और "मै "


मै ‘तुम’ मे समां जाऊं ‘तुम’ ‘मुझ’ मे समां जाओ
दूरी न रहे कोई आज इतने करीब आओ”

   कहने को तो ये एक गीत की पंक्तियाँ हैं लेकिन इस के गहरे मे उतरें तो ये महसूस होता है कि भक्त अपने भगवान से कह रहा है ,अरदास कर रहा है कि मुझ मे और तुम मे अब कोई दूरी न रहे, मेरे दिल मे तुम्हारी छवि ,तुम्हारी मूरत ऐसे बस जाए कि अब मुझे तुम्हारे सिवा और कुछ दिखाई ही न दे ! गुरु को दृष्टि कर के ये कह रहा है, भावना कर रहा है  कि अब सोते,जागते,उठते बैठते ,खाते ,पीते मुझे तुम्हारी शिक्षा ,तुम्हारे वचन याद भी रहें  तो जीवन की  जीवन की आधी से ज्यादा समस्या यूँ ही पल भर मे समाप्त हो जाएँ !
कविवर कैलाश चंद जैन अपने एक गीत मे कहते हैं

प्रभु देख तुम्हारी छवि हमारा मन आज हुआ दीवाना है
हम सब ने मिलकर आज यहाँ प्रभु वीर तेरा गुण गाना है    
सभी मुनि,आर्यिकाओं ,साधु,साध्वियों,श्रावक,श्राविकाओं
को यथोचित नमोस्तु ,वन्दामि , मत्थेण वन्दामि ,जय जिनेन्द्र,नमस्कार

शुभ प्रात:

Monday, 2 January 2012

आज का विचार 02.01.2012

संसार मे ऐसा स्थान हैं कि जहाँ चाँद सूर्य की गति 
न हो ,लेकिन ऐसा कोई स्थान नही है जहाँ कर्म की 
गति न हो !

आर्यिका 105 माता स्वस्ति भुषण जी की 
“एक लाख की एक एक बात “ से 
सभी मुनि,आर्यिकाओं ,साधु,साध्वियों,श्रावक,श्राविकाओं
को यथोचित नमोस्तु
,वन्दामि , मत्थेण वन्दामि ,जय जिनेन्द्र,नमस्कार

शुभ प्रात:

आज का विचार 02.01.2012

मै रहूँ न रहूँ ये जहाँ मुझे याद करे !

सभी मुनि,आर्यिकाओं ,साधु,साध्वियों,श्रावक,श्राविकाओं
को यथोचित नमोस्तु ,वन्दामि , मत्थेण वन्दामि ,जय जिनेन्द्र,नमस्कार

शुभ प्रात: 


Sunday, 1 January 2012

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि


        सुरभिपुर मे जगभूति नाम का एक विद्वान था जो अपने शिष्यों के साथ सामुद्रिक शास्त्र मे बड़ा निपुण कहा माना जाता था ! वो एक समय शिष्यों के साथ गंगा स्नान के लिए निकला ! थोड़ी दूर पर उसे किसी के पद चिन्हों के निशान दिखाई दिये ! उन पद चिन्हों को देख कर जगभूति आश्चर्यचकित हो उठा ! उसे लगा यह पदचिन्ह तो किसी चक्रवर्ती  या सम्राट के ही हो सकते हैं !  उसने अपने शिष्यों से उन पदचिन्हों का पीछा करके ये पता लगाने को कहा कि ये पदचिन्ह किसके हैं ! उसके मन मे ये उत्साह था कि वो भावी चक्रवर्ती या सम्राट को ये घोषणा कर के बड़ा इनाम व स्वर्ण मुद्राओं का हकदार हो सकता है! शिष्य लौट कर आये तो उसे उन की बात पर विश्वास नही हुआ ,एक शिष्य ने उसे कहा था कि जिस व्यक्ति के ये पदचिन्ह हैं ,वह और कोई नही बल्कि एक नग्न दिगम्बर साधु है !
          यह कैसे हो सकता है –उसने अपने ज्ञान का फिर से उपयोग किया और पाया कि यह समुद्र शास्त्र के मुताबिक़ तो किसी चक्रवर्ती अथवा सम्राट के ही पदचिन्ह हो सकते हैं ! एक बार को उसे लगा कि सारा समुद्र शास्त्र झूठा है ,बेकार है और वो उस शास्त्र को गंगा नदी मे प्रवाहित करने को उद्दयत हो गया ! मार्ग मे उसकी  एक और परिचित विद्वान से मुलाक़ात हुई तो उसने अपने संशय का निवारण चाहा ! वह विद्वान उस  नग्न दिगम्बर साधु के चरित्र और गुणों से परिचित था ! उसने समझाया कि तुम्हारा ज्ञान बिलकुल सही है और वह दिगम्बर साधु कोई और नही ,स्वयं चरित्र चक्रवर्ती और योग सम्राट महावीर हैं ,जिसके चरणों मे  दुनिया नतमस्तक होती है !
      ओह –मेरी दृष्टि को ये क्या हो गया था ? मै स्वयं क्यों उन्हें नही पहचान पाया ! जैसे ही उसकी दृष्टि बदली ,उसकी तो सृष्टि ही बदल गयी ! उसने आध्यात्म ग्रंथों का मनन चिंतन किया व कालान्तर मे अपने शिष्यों के साथ भगवन महावीर के समवशरण मे जाकर दीक्षित हुआ और आत्म कल्याण करके धन्य हुआ !  

आज का विचार 01.01.2012



नव वर्ष 2012 की हार्दिक शुभ कामनाएं ! 
आज गा लो मुस्कुरा लो महफ़िलें सजा लो न जाने कल कोई साथी छूट जाए जीवन की डोर बड़ी कमजोर !पिछले समय को भूल कर एक नई शुरुआत करें और जिंदगी जैसे हमें मिली है उसमे खुश रहें और दूसरों को खुशियाँ  बांटे ,"झूठ से बचे रहें और सच का दम भरें "महावीर का सत्य व अहिंसा का मार्ग अपनाएँ !

Happy New Year 2012
Live in present and enjoy the life as it comes to us because we know life is too short to be remembered by the past and thinking of the future and hence living and enjoying the present is the best we could do.Try our best to distribute happiness. Follow the path of Lord Mahavira of truth and non voilence .


सभी मुनि,आर्यिकाओं ,साधु,साध्वियों,श्रावक,श्राविकाओं
को यथोचित नमोस्तु ,वन्दामि , मत्थेण वन्दामि ,जय जिनेन्द्र,नमस्कार

शुभ प्रात: