मेरा अपना इसमें कुछ भी नहीं .........
जो भी कुछ यहाँ लिखा है जिनेन्द्र देव और जैन तीर्थंकरों की वाणी है !
जैन साधुओं व साध्वियों के प्रवचन हैं !!
सभी को इसे Copy/Share करने की स्वतंत्रता है !
कोई कापीराइट नहीं ..........
Tuesday, 25 December 2012
Sunday, 23 December 2012
आँचल में है दूध और आँखों में पानी
जैसे
मांस पर गिद्ध मंडराते हैं ,वैसे ही महिलाओं पर ये कामान्ध नर गिद्ध मंडराते ही
रहते हैं ! गिद्ध तो बेचारे मरे हुए पशुओं का ही मांस नोचते खाते हैं ,पर ये कामी कुत्ते तो ज़िंदा नारियों का
मांस नोचने को फिरते हैं कदाचित किसी महिला में कहीं कोई कमजोरी दिखी नहीं ,कोई
महिला बेचारी अकेली दिखी नहीं ,उसे डरा धमकाकर ब्लकमेल कर और जोर जबरदस्ती कर
पथभ्रष्ट करने से नहीं चुकते ! कवि की ये पंक्तियाँ बरबस ही याद हो उठती हैं
नारी
जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी
आँचल में
है दूध और आँखों में पानी
आज देश
/प्रदेश में सरकारें चाहे जो भी दावा करें, कानून व्यवस्था की स्तिथि ठीक नहीं है। चोराहों पर पुलिस
वालों को चंदा इकठ्ठे करने के सिवा शायद कोई काम नहीं! अकेले रहने वाली महिलाओं का
जीवन सुरक्षित नहीं रह गया है। राह चलते महिलाओं के साथ बदतमीजी, चेन स्नेचिंग आम बात है। लेकिन इस चलती बस में सामूहिक बलात्कार की शर्मनाक व वीभत्स घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है ! जागो हिन्दुस्तान जागो ......
Saturday, 22 December 2012
निज परिणति से हम दूर हुए
निज परिणति से हम दूर हुए
यदि हमें सच्चा सुख व असली यश
कहीं प्राप्त हो सकता है तो वह है हमारा चरित्र ! चरित्रवान व्यक्ति को यह दोनों
बातें अनायास ही प्राप्त हो जाती हैं !चरित्रवान व्यक्ति ही जीवन में सुख व यश के
पात्र होते हैं !
निज परिणति से हम दूर हुए
परिजन के पालन की धुन में ,
धन संचय की उधेड़बुन में ,
पर को समझाने के चक्कर में !
निज को समझाना भूल गये!
निज परिणति से हम दूर हुए !!
सब धन की धुन में हैं अटके,
पर परिणति में हैं भटके ,
पर के सत्पथ दिग्दर्शन में !
संकल्प विकल्प सहस्त्र हुए !
निज परिणति से हम दूर हुए !!
पर से सुख पाने के भ्रम में,
वैभव संग्रह के श्रम में ,
पर में ही हम मशगुल हुए!
थक थक कर चकनाचूर हुए !
निज परिणति से हम दूर हुए !!
पद पाने की धुन के पक्के ,
खाकर के भी सौ सौ धक्के ,
सच्चे झूठे वादे करके !
पद पाने में हैरान हुए !
निज परिणति से हम दूर हुए !!
पंडित रतनचंद जी जैन भारिल्ल
“ऐसे क्या पाप किये मैंने” में
Friday, 21 December 2012
आत्म – विश्वास
धन ,बल और बुद्धि जहाँ हार
जाते हैं वहाँ आत्म – विश्वास ही मनुष्य को सहारा देकर संकटों से उबार सकता है !
एक सेठ था ! उसके थे दो बेटे !
सेठ ने अपने दोनों बेटों को उपदेश दिया –तुम दोनों दुनिया भर में कोठियां बनाओ !
अब एक लड़का तो सच में ही जगह जगह कोठियां बनाने लगा ! आखिर कहाँ तक बनाता ? वह थक
गया ! धन भी जबाब दे गया !
दूसरा लड़का अधिक बुद्धिमान
था ! उसने कोठियां बनाने की बजाय जगह-जगह मित्र बनाने शुरू कर दिये ! इसमें वह जरा
भी नहीं थका और अपने भाई से बहुत आगे निकल गया ! क्योंकि उसके लिए मित्रों की
कोठियों के द्वार हमेशा खुले रहते थे !
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