मेरा अपना इसमें कुछ भी नहीं .........

जो भी कुछ यहाँ लिखा है जिनेन्द्र देव और जैन तीर्थंकरों की वाणी है !

जैन साधुओं व साध्वियों के प्रवचन हैं !!

सभी को इसे Copy/Share करने की स्वतंत्रता है !

कोई कापीराइट नहीं ..........

Monday, 13 August 2012

जय जिनेन्द्र


जय जिनेन्द्र
सर्वप्रथम हमें अपने बिस्तर से उठकर कदम नीचे रखने के बाद अगर घर के पास ही जिनालय है  तो अपने घर की छत पर जाकर मन्दिर के शिखर ,कलश ,ध्वजदंड और मान सतम्भ के दर्शन करने चाहिये ! अगर जिनालय पास नहीं है तो उस दिशा में मुहँ करके नमस्कार करें जिस दिशा में जिनालय है ,इनके दर्शन से हमें जिनालय की पवित्र उर्जा का लाभ मिलता है ! रोज शिखर के दर्शन करने से हमें सफलता के शिखर प्राप्त होता है ! ध्वजा के दर्शन करने से उस ध्वजा के समान हमारी कीर्ति फहराती है अर्थात सब जगह हमारा नाम होता है ! कलश के दर्शन से घर में धन की वृद्धि होती है ! परिवार के पुण्य की वृद्धि होती है ! मान स्तम्भ के दर्शन से समाज में सम्मान की प्राप्ति होती है !
उसके बाद बड़ों छोटों सभी को जय जिनेन्द्र करना चाहिये ! ज्योतिष के अनुसार पिता को प्रसन्न करने से सूर्य ग्रह अनुकूल होता है ,सूर्य ग्रह के अनुकूल होने से व्यापार और नौकरी आदि में सफलता मिलती है !कानूनी अडचनें सुलझ जाती हैं ! आचार्यों ने कहा है :-
जयकारो जन्म विच्छेद: ,
यकारो यम नाशनम्
जन्म मृत्यु विनाशाय
जय इति प्रोच्यते =   जय जिनेन्द्र
जयकार    हमारे जन्म सम्बन्धी दुःख को विच्छेद करने वाला है ! यकार
हमारी  मृत्यु पर हमें विजय दिलाने वाला है !
जन्म और मृत्यु सम्बन्धी दुःख पर विजय पाने के लिए जीवन के हर क्षेत्र में जय विजय पाने के लिए हमें बार बार जय जिनेन्द्र बोलना चाहिये ! बात की शुरुआत में और अन्त में जय जिनेन्द्र बोलने से बहुत लाभ होते है !
आचार्य श्री गुप्तिनंदी जी की प्रात: कालीन कक्षा से

Saturday, 11 August 2012

श्वासों के स्वर


श्वासों के स्वर
जी हाँ ! आचार्यश्री कहते हैं आती जाती श्वाँस भी कुछ कह जाती है ! हमारी नाक से निकलने वाली सांस को स्वर कहते हैं !
नाक के दायें (Right)छिद्र से सांस चल रही हो तो सूर्य स्वर कहते हैं ! इसे इडा नाडी भी कहा जाता है !
नाक के बाएं(Left) छिद्र से सांस चल रही हो तो चन्द्र स्वर कहते हैं ! इसे पिंगला नाडी भी कहा जाता है !
नाक के दोनों (Both)छिद्रों से सांस चल रही हो तो इसे काल स्वर कहते हैं ! इसे सुषुम्ना नाडी भी कहते हैं !
सुबह उठकर अपने आराध्य देव का स्मरण करें और पलंग से पाँव नीचे रखने से पहले देखें सूर्य या चन्द्र जो स्वर चल रहा हो उसी तरफ वाला पैर जमीन पर नीचे पहले रखें ! अगर काल स्वर चल रहा हो तो कुछ सेकेंड महसूस करें ,जिस छिद्र से सांस तेज आ रहा हो वह पैर पहले जमीन पर रखें ! इस नियम का पालन हर कार्य में करें जैसे घर से बाहर जाते हुए ,गाडी में बैठते हुए ,गाडी से उतरते हुए ,ऑफिस में पहला कदम रखते हुए आदि !इस तरह कार्य करने से आपका सारा दिन सफल रहने के मौके बढ़ जाते हैं !
जब दोनों स्वर एक साथ चल रहे हों यानि काल स्वर हो तब भूल कर भी कोई नया कार्य न करें ! अन्यथा वह कार्य निष्फल ,असफल हो जाता है !लेकिन पूजा पाठ ,धार्मिक अनुष्ठान ,मन्त्र जाप आदि काल स्वर के चलते अवश्य करने चाहियें !काल स्वर में मंत्र जल्दी सिद्ध होते हैं ! थोड़े से अभ्यास से कोई भी मन्त्र जाप आदि करते हुए काल स्वर को पा सकता है ! काल स्वर प्राप्त करने के लिए लंबी साँसे लें !किसी को शुभ कामनाएं ,आशीर्वाद देते हुए काल स्वर अति फलदायी होता है !काल स्वर के चलते कोई प्रश्न या भविष्यवाणी बिलकुल नहीं करें !
सूर्य स्वर के चलते किसी नए कार्य की शुरुआत ,भोजन ग्रहण करना भाषण ,शास्त्रार्थ आदि अच्छा रहता है !
औषधि ग्रहण करना ,जल ग्रहण करना ,ज्ञान दान ,विद्या प्राप्ति आदि चन्द्र स्वर में अच्छा रहता है !
आचार्य श्री गुप्तिनंदी जी की प्रात: कालीन कक्षा से

Thursday, 9 August 2012

श्रीकृष्ण –कुछ जाने अनजाने तथ्य !


सभी मित्रों को श्रीकृष्ण जन्म अष्टमी की हार्दिक बधाई ! शुभ संध्या !
श्रीकृष्ण –कुछ जाने अनजाने तथ्य !
कृष्ण का जीवन न तो राम की तरह  बनवासी का रहा न ही महावीर की तरह  सन्यासी का लेकिन एक संघर्षमय जीवन रहा ! भादों कृष्ण सप्तमी –अष्टमी की रात्रि को कृष्ण का जन्म जेल में हुआ ! जेल में जन्म लेना बुरा नहीं है ,जेल में ही जीवन को बिता देना जरूर बुरा है !
वसुदेव को कृष्ण के जन्म लेते ही कृष्ण को लेकर अर्ध रात्रि में निकलना पड़ा और जैसे जेल से भी उन्हें रास्ता आप ही आप मिलता चला गया ! श्रीकृष्ण का भाग्य जो साथ था !
यमुना नदी अपने उफान पर थी ! पानी ने जैसे उन्हें आकर अंगूठे तक छुआ ,जैसे उनके हाथ लग कर जमुना भी पवित्र हो जाना चाहती हो , वैसे ही जमुना का उफान समाप्त हो गया और रास्ता मिलता चला गया !
कृष्ण को मारने के लिए पूतना राक्षसी को भेजा था कंस ने लेकिन कृष्ण ने उस की छाती पर चढ कर उसी का वध कर दिया !
वर्ष की उम्र में ही कृष्ण को मल्ल युद्ध के लिए निकलना पड़ा सत्य और न्याय नीति के लिए ! मल्ल उनसे हारे और उन्होंने सत्य न्याय और नीति का साम्राज्य स्थापित किया !
एक दिवस उनकी उंगली में कुछ चोट लग गयी तब धनुर्धर अर्जुन की पत्नी द्रौपदी ने अपनी साड़ी से पट्टी फाड़ कर उनके हाथ पर बाँधी थी ,यानि श्रीकृष्ण को अपना भाई बना लिया था !जब द्रौपदी का भरी सभा में दुर्योधन आदि कौरवों के द्वारा अपमान किया जा रहा था तब भीष्म पितामह आदि अपने वचन से बंधे हुए बेबस थे ,दुशासन द्रौपदी का चीर हरण करने पर उतारू था ,उस समय कृष्ण ने अपने ऊपर किये हुए उपकार का बदला द्रौपदी का चीर बढ़ा कर उसकी रक्षा करके दिया था !
यह बता दिया जाए की हरिवंश पुराण के अनुसार द्रौपदी केवल अर्जुन की ही पत्नी थी ,सती स्त्री थी ,वरमाला डालते हुए तेज हवा से माला टूट गयी थी और पुष्प छिटककर पास ही बेठे हुए बाकी चरों पांडवों पर भी गिर गये थे ! इस कारण से यह भ्रान्ति उत्पन्न हो गयी कि द्रौपदी ने पाँचों पांडवो को वरा था ! गांडीव धनुष को महाधनुर्धर अर्जुन द्वारा ही उठाया जा सकता था और उसी ने ही निशाना साध कर द्रौपदी को स्वयम्वर में जीता था !
कृष्ण और सुदामा की बेमिसाल दोस्ती किसी से छिपी हुई नहीं है ! आज कहाँ ऐसी मित्रता ,कहाँ ऐसा समर्पण !
एक समय किसी महर्षि ने उन्हें पूछा कि महा रूपसी  और गुणवान रुक्मणि ,सत्यभामा ,जाम्बवंती आदि 16000 रानियों के होते हुए आप गोपियों पर ही क्यों इतना स्नेह रखते है तब उन्होंने कहा कि ये रानियाँ अपने राज रानियाँ होने के अहंकार में जीती हैं ,गोपियों की  निश्छल प्रीति ,निस्स्वार्थ प्रेम की तुलना आप इन रानियों से कैसे कर सकते हैं ! उन्होंने कहा कि जाओ रनवास में जाओ और कहना श्रीकृष्ण को भयंकर पेट में दर्द हुआ है ,जो भी रानी अपने चरणों कि रज पानी में घोल कर पीला दे ,तभी श्रीकृष्ण का पेट दर्द ठीक हो सकता है ,लेकिन याद रहे उस के बाद  उस रानी को नरक में जाना पड़ेगा ! एक एक करके सभी रानियों से जब पूछ लिया गया तो सभी ने शर्त सुनकर मना कर दिया ! तब वह महर्षि गोकुल पहुंचे तो तुरंत गोपियों ने कहा कृष्ण के जीवन के लिए एक बार तो क्या सौ बार भी नरक जाना पड़े तो हम तैयार हैं !
ऐसा था उनका समर्पण ! निश्छल, निस्स्वार्थ प्रेम !
एक समय रुक्मणि ने कहा –स्वामी ! 16000 रानियाँ होते हुए भी आप मुरली के ही पीछे क्यों भागते हैं ! हर समय उसे ही हाथों में उठाये रहते हैं ! तब कृष्ण ने कहा –रुक्मणि ! ये मुरली जब हम इसे बुलवाते हैं तभी बोलती है ,जितना बुलवाते हैं उतना ही बोलती है और जब भी बोलती है मीठा ही बोलती है ,क्योंकि मुरली में कोई गाँठ नहीं है ,और तुम सब रानियाँ ........?
आचार्य श्री गुप्तिनंदी जी गुरुदेव के जन्म अष्टमी के उपलक्ष्य में विशेष  प्रवचन से

Wednesday, 8 August 2012

ओउम् ह्रीं श्रीं अर्हं नम:


सब प्रकार के दुखों के निवारण और पुण्य वृद्धि के लिए मंगलकारी मन्त्र
ओउम्  ह्रीं  श्रीं  अर्हं  नम:
ओउम् के जाप से पाँच  परमेष्ठी को नमस्कार किया जाता है ! हमारे  शरीर के चारों और इससे रक्षा कवच बनता है और अगले भवों में केवलज्ञान की प्राप्ति होती है !
ह्रीं  के जाप से हर प्रकार के विघ्न और पापों का नाश होता है ! चौबीस तीर्थंकरों और सभी आध्यात्मिक  शक्तियों को नमस्कार होता है !
श्रीं   के जाप से मुख्या रूप से हमारे अन्तराय कर्म का नाश होता है व्यापारिक अडचनों व आर्थिक समस्याओं को समाप्त करके आय के नए स्तोत्र खुलते हैं ! श्रीं में महालक्ष्मी , लक्ष्मीपति और समव्शरण को नमस्कार किया गया  है !
अर्हं  के जाप से अयोग्य व्यक्ति में भी योग्य व्यक्ति के गुण प्रकट होने लगते हैं और हर जगह उच्च पद व स्थान मिलता है ! अर्हं में सभी अरिहंतों को ,महापुरुषों को ,उच्च पद पर आसीन महानुभावों को नमस्कार किया गया है !
स्वास्थय लाभ ,व्यापार वृद्धि ,समृद्धि ,उच्च पद की प्राप्ति के लिए हमें हर रोज इस गुरु मन्त्र की तीन माला रोज जपनी चाहियें !
आचार्य श्री गुप्तिनंदी जी की प्रात: कालीन कक्षा से

Tuesday, 7 August 2012

गुरु के समान कोई नहीं


आचार्यश्री गुप्तिनंदी जी द्वारा 6.8.2012 को रोहतक में दिया गया सायंकालीन प्रवचन 

गुरु के समान कोई नहीं
उज्जैन नगर में किसी समय में राजा नन्दिवर्धन राज्य करते थे ! महान निति निपुण राजा थे ! उनके राज्य में प्रजा को हर तरह से सुख था ! उनका एक पुत्र था ,नाम था चंड प्रद्द्योत ! राजा ने उसे हर तरह की शिक्षा दी थी जिससे कि वह बड़ा होकर न्याय नीति व निपुणता से प्रजा का जीवन सुखी कर सके ! राजा का सोचना था कि वह राज कार्य और शस्त्र विद्या के अलावा समस्त ग्रंथों और भाषाओं का भी अध्ययन करे ! एक समय उज्जैन राज्य में कालसंदीप नाम के विख्यात पण्डित पधारे ! राजा ने उनकी ख्याति सुनकर उसे काल संदीप जी के पास मलेच्छ भाषा सीखने के लिए भेज दिया !
मलेच्छ भाषा पढते हुए राजकुमार को कुछ शब्द ऐसे थे जिन्हें बोलने और पढ़ने में अति कठिनाई का सामना करना पड़ता था ! इस कारण से उसे कई बार गुरु कि डांट  खानी पड़ती थी ! एक दिन काफी समझाने पर भी राजकुमार जब कुछ शब्दों का सही लेखन व उच्चारण नहीं कर पाया तो उसे गुरु  से मार खानी पड़ी !तब राजकुमार ने गुस्सा करके मन में यह निश्चय किया कि जिस हाथों से तुमने मुझे मारा है वही हाथो और पैरों को मै अपने हाथों से पीटूँगा ! काल संदीप तो अपना पाठन का कार्य करके चले गये !

कुछ समय बीतने के बाद राजा नंदी वर्धन को अपने जीवन की शाम दिखाई दी और वह राजकुमार चंड प्रद्द्योत को अपना राज्य सौंपकर जिन दीक्षा धारण कर वन् में चले गये ! कुछ समय बीत जाने पर राजा के गुप्तचरों को एक पत्र प्राप्त हुआ जिसका लेखन किसी भी दरबारी के समझ में नहीं आ रहा था ! अन्त में वह पत्र राजा चंड प्रद्द्योत के पास लाया गया और वह पत्र देखते ही राजा की आँखें चुधियाँ गयी ! पल पल राजा के चेहरे के बदलते भावों को देखकर दरबारी दंग थे ! कुछ न समझ पाने पर एक वरिष्ट मंत्री ने पूछा –राजन ! पहली बात तो यह कि यह पत्र ऐसी कौन सी भाषा में है और दूसरा यह कि इस में ऐसा क्या लिखा है कि आप एक दम से इतने चिन्तित और भय और आश्चर्य मिश्रित दिखाई देते हैं !
राजा ने उत्तर दिया –मन्त्रिवर ! यह पत्र मलेच्छ भाषा में लिखा है और इसमें लिखा है कि दुश्मन देश के राजा ने उज्जैन पर आक्रमण के लिए नजदीक ही की तिथि निश्चित की है ! मै आज अपने को बड़ा धन्य मान रहा हूँ कि मैंने काल संदीप गुरु के पास जो ज्ञान प्राप्त किया था वो आज काम में आया है ! जाओ तुरंत दुश्मन का सामना करने को सेना को तैयार करो और कुछ ही समय में राजा ने ही उस शत्रु पर आक्रमण करके उसे परास्त कर दिया और मंत्री से कहा कि अपने सैनिकों  को आदेश दो कि मेरे गुरु काल संदीप जी जहाँ कहीं भी है उन्हें खोज कर मुझे सूचित करें !
कुछ समय बाद काल संदीप को ढूंढते हुए जब राजा के सैनिकों को मालूम पड़ा कि गुरु तो जगतगुरु बन गये हैं और स्वयं और विश्व के कल्याण के लिए उन्होंने जैनेश्वरी दीक्षा स्वीकार की है तो उन्होंने यथास्थिति राजा को सूचित की ! राजा तुरंत ही वरिष्ट मंत्रियों व प्रजाजनों को लेकर उनके दर्शनार्थ गया और गुरु के चरणों में अपनी खूब निंदा व प्रतिक्रमण किया ! राजा ने मंत्रियों से कहा कि आज हम सब जो दुश्मन राजा की खबर पा सके हैं तो इन गुरुदेव के दिये हुए ज्ञान के कारण ही पा सकें हैं !
राजा की इतनी बातें सुनकर व काल संदीप मुनि का चरित्र सुनकर उनके राज्य का एक युवक को वैराग्य उत्पन्न हो गया व उसने मुनिश्री के चरणों में अपना कल्याण करने की इच्छा की व जैनेश्वरी दीक्षा देने की प्रार्थना की ! उन मुनि का नाम श्वेत संदीप पड़ा !भगवान महावीर का समवशरण जब विपुलाचल पर्वत पर  आया तब उस समय वह श्वेत संदीप मुनि पास ही आतापन योग में स्थित थे ! राजा श्रेणिक जब विपुलाचल पर्वत पर भगवान के समवशरण में दर्शन करने के लिए आया तब रास्ते में उन्हें मुनिराज के दर्शन हुए तो उसने हाथी से उतरकर मुनिराज को नमस्कार किया व मुनिराज का तप और कंचन सी जगमगाती काया को देखकर पूछा कि हे मुनिराज आपके गुरु कौन हैं ! मुनिराज के मुख से अनायास ही निकल गया कि तीर्थंकर वर्धमान महावीर ही मेरे गुरु हैं ! इतना कहना था कि मुनिराज की कंचन सी काय काली पड गयी ! मुनिराज की काय को काली पड़ी देखकर राजा श्रेणिक को कुछ समझ नहीं आया व मुनिराज को यथोचित प्रणाम करके भगवान के समवशरण की ओर चल पड़ा !
समवशरण में राजा श्रेणिक ने जाकर प्रभु से सारा वर्तान्त कहा और मुनिराज की देह के काला होने का कारण पूछा ! महावीर प्रभु ने अपनी दिव्य देशना में कहा कि हे राजा श्रेणिक उन मुनिराज से एक भूल हो गयी है कि उन्होंने अपने गुरु का नाम न बताकर मुझे ही अपना गुरु कह दिया जबकि उनके दीक्षा गुरु जो हैं वो काल संदीप जी हैं और वह इस समय समव शरण में ही विराजमान हैं !
राजा श्रेणिक कुछ समय बाद प्रभु के दर्शन कर वापस लौटे ! और रास्ते में फिर से मुनिराज श्वेत संदीप के दर्शन करने के लिए रुके !  राजा श्रेणिक ने उन मुनिराज को संबोधित करते हुए कहा कि हे मुनिराज ! तीर्थंकर प्रभु की दिव्य ध्वनि में यह आया है कि आपके दीक्षा गुरु काल संदीप जी हैं लेकिन अनायास ही आपके वर्धमान स्वामी को अपना गुरु कहने से आपकी यह कंचन सी स्वर्णमयी काय काली हो गयी है ! एक पल में ही मुनिराज के विचार परिवर्तित हो गये ! ओह ये मुझसे क्या हो गया ? कैसे हो गया ? क्यों हो गया ? कैसे मै अपने उपकारी को एक क्षण के लिए ही सही भूल गया ! धिक्कार है मेरे इस जीवन को ! काय वापस कंचन सी हो गयी व अत्यन्त विशुद्धि की स्थिति उत्पन्न हो गयी और अंतर्मुहुरत में ही मुनिराज को केवलज्ञान की प्राप्ति हो गयी व अरिहंत बन गये !

आचार्यश्री ने कहा कि कभी भी हमें गुरु के किये हुए उपकार को नहीं भूलना चाहिये और कभी भी किसी की दी हुई शिक्षा को अपनी कहकर या उसकी जगह किसी और की  कहकर अपनी बडाई नहीं करनी चाहिये ! यही इस द्रष्टान्त का उपदेश है और यही मेरा उद्देश्य है !
इस दृष्टान्त को प्रस्तुत करने में जो त्रुटि रह गयी हों वो मेरी अपनी हैं व उनके लिए मै क्षमा प्रार्थी हूँ ! सुधिजन मेरा मार्गदर्शन करें !
आचार्यश्री गुप्तिनंदी जी द्वारा 6.8.2012 को रोहतक में दिया गया सायंकालीन प्रवचन

Saturday, 4 August 2012

उज्जैन का चोर


उज्जैन का चोर
प्राचीन समय की बात है उज्जैन में राजा धनपाल का राज्य था ! एक दिवस उनकी महारानी सखियों के साथ उद्यान में टहल रही थी ! रानी अपने पूरे सोलह सिंगार में थी व उन्होंने हीरे का जगमगाता हार पहना हुआ था ! एक वेश्या भी वहाँ टहल रही थी ! नाम था वसंतसेना ! तब उसने रानी के गले में वह बेशकीमती हार देखा ! उस हार को देखते ही उस के तो जैसे होश ही उड़ गये ! अब उसे इस हार के अलावा और कुछ दिखाई नहीं पड रहा था !
वह जैसे तैसे अपना भवन में आई ,लेकिन मन में अभी भी उस हार की अपने गले में होने की कल्पना कर रही थी ! उसे अब न दिन में चैन था न रात को नींद ! हार के बिना जैसे जीवन बेकार !
दो तीन दिन बीते ! उस का प्रेमी एक चोर था ,नाम था दृढ़सूर्य ! अब वेश्या का प्रेम तो होता ही ऐसा है ,जब तक पैसा है तब तक रहता है,तब तक ही रहता है  और व्यक्ति उसकी जवानी के क्षणिक सुख के चक्कर में अपना भला बुरा सब कुछ भूल जाता है ! चोर ने उस वेश्या से उसके मुरझाए होना का कारण पूछा ! पता लगने पर उस चोर ने कहा –तुम उस हार का ख्याल अपने दिमाग से निकाल दो ,मै तुम्हे वैसा ही दूसरा हार लेकर के दे दूँगा !
लेकिन वसंतसेना कहाँ मानने वाली थी उसके दिलो दिमाग पर तो वही हार चढा हुआ था ! वेश्या की हठ के सामने उस चोर को झुकना पड़ा ! सच ही कहा है व्यक्ति को भले बुरे का ख्याल कहाँ रहता है वेश्या के चक्कर में पडकर ! सात व्यसनों में वेश्या गमन को घोर दुःख का व नरक का कारण बताया गया है !
पहुँच गया राजा के महल में और किसी तरीके से रानी के गले से वह हार निकाल भी लाया ,लेकिन बाहर निकलते हुए हीरे की चकाचौंध रोशनी में सिपाहियों द्वारा पकड़ लिया गया ! राज दरबार में पेश किया गया ! शूली दण्ड दे दिया गया ! जब बीच चौराहे पर दण्ड दिया जा रहा था ,और उसके प्राण निकलने को थे तब उसे जिनदत्त सेठ दिखाई दिया ! सेठ की ख्याति थी पूरे नगर में ! चोर ने सेठ से कहा –मुझे थोडा पानी पिलवा दो ,सेठ ने उसे कहा मेरे गुरु ने मुझे एक मन्त्र दिया है ये मन्त्र तुम याद रखना जब तक मै पानी लेकर के आता हूँ ,और ये कहकर नमोकार मन्त्र उसे दे दिया ! नमोकार को रटते रटते उस के प्राण निकल गये ! जब सेठ कुछ समय बाद लौट कर के आया तो जैसे कि उसे आभास था ,उसके प्राण निकल चुके थे ! सेठ अपने मन में आश्वस्त था कि एक मरते हुए प्राणी को चाहे वो कितना पापी ही था वह नमोकार मन्त्र दे पाया और नमोकार का जाप करते हुए ही उसके प्राण निकले !
वह चोर मरकर के सौधर्म स्वर्ग में जाकर के देव बना ! उधर राजा के सिपाहियों ने जाकर राजा के कान भर दिये के सेठ जिनदत्त भी शायद चोर से मिला हुआ है ! राजा ने कहा –जाओ तुरंत सेठ को बुलाकर ले कर आओ ! राजा के सिपाही उसे लेने पहुंचे ! उधर देव ने अपने अवधिज्ञान से जाना कि मेरी पर उपकार करने वाले के ऊपर मेरे ही कारण से उपसर्ग आया है ,तब उसने आकर राजा के सिपाहियों से सेठ को बचाया और राजदरबार में भी सेठ का मान सम्मान हुआ ! राजा ने भी जैन धरम स्वीकार किया और जैन धरम की बहुत प्रभावना हुई !
मित्रों  !  ऐसी महान महिमा है नमोकार महामंत्र की ! जय जिनधर्म ! जय जिनागम !
आचार्य श्री 108 गुप्तिनंदी जी के 04.08.2012 के सायं कालीन प्रवचन से

Wednesday, 1 August 2012

आचार्य श्री गुप्तिनंदी जी महाराज का 40 वां जन्म जयंती समारोह


आज दिनांक 1.8.2012 को आचार्य श्री   गुप्तिनंदी जी महाराज का  40 वां जन्म जयंती समारोह बड़े धूमधाम से यहाँ रोहतक में मनाया गया ! मेरी और से उनके चरणों में विनयांजली ! 

विषयों से अति दूर हुए हैं , कषाय गण को चूर किया
निरारम्भ हैं पूर्ण रूप से ,सकल संग को दूर किया
ज्ञान ध्यान तप में रत हो अपना जीवन बिता रहे
महा तपस्वी कहलाते हैं ,हमें मनस्वी बना रहे

धरती सेज ,ओढना अम्बर, चिंतन है जिनका भोजन
जियो और जीने दो सबको ,है जिनका जीवन दर्शन
उपदेशामृत से अन्तर के सब पट खोल दिये हैं
गुढ़ गुढ़ प्रश्नों के उत्तर ,हँस –हँस कर बोल दिये हैं

है समय नदी की धार सभी बह जाया करते हैं
है समय बड़ा बलवान प्रबल ,पत्थर झुक जाया करते हैं
हमने देखा है लोग समय के चक्कर खाया करते हैं
कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो इतिहास बनाया करते हैं 

ऐसे ही हैं प्रज्ञा योगी आचार्य श्री  गुप्तिनंदी जी महाराज ! उनके चरणों में बारम्बार नमन !