मेरा अपना इसमें कुछ भी नहीं .........

जो भी कुछ यहाँ लिखा है जिनेन्द्र देव और जैन तीर्थंकरों की वाणी है !

जैन साधुओं व साध्वियों के प्रवचन हैं !!

सभी को इसे Copy/Share करने की स्वतंत्रता है !

कोई कापीराइट नहीं ..........

Wednesday, 29 February 2012

           दुनिया को मैंने नही भोगा ,बल्कि दुनिया के द्वारा मै भोगा गया हूँ !काल को मैंने समाप्त नही किया ,बल्कि काल के द्वारा मुझे समाप्त कर दिया गया है ! दुनिया को मै संतप्त नही कर पाया ,बल्कि दुनिया ने मुझको संतप्त किया है ! तृष्णा जीर्ण नही हुई बल्कि मै जीर्ण हो गया !जो मेरी थी ,मेरी है ,और मेरी रहेंगी ऐसी आत्मा को भोगने का प्रयास नही किया कभी ! अब तो मुझे अपनी आत्मा का स्वाद लेना है !यही अंतिम एवं सबसे बड़ा कार्य शेष रहा है ! ऐसा विचार करता हुआ ही मनुष्य आकिंचन धर्म की ओर बढ़ने का प्रयास कर सकता है !सबसे कठिन कार्यभव्य जीव के लिए  है अपने से ही मुलाक़ात करना ! जीव की एक बार अपने आप से मुलाक़ात हो जाए वह दुनिया की समस्त तस्वीरें भूल जाता है ओर जब भी किसी तस्वीर को देखने का भाव करता है तो तुरंत उसका ज्ञान बोल पड़ता है कि ;
     अपनी  आत्मा मे ही है तस्वीरे यार दुनिया की ,जब जरा गर्दन झुकाई देख ली !
            एक म्यान मे दो तलवारें नही रह सकती ! सांसारिक पर पदार्थों को भोगने की लालसा जिस व्यक्ति मे है उसे सच्चा सुख ,आत्मा का सुख प्राप्त नही हो सकता !  न तो परिग्रह वान  को मोक्ष मिला है न ही मिलेगा कभी ! किसी ने कहा है ;
दुनिया    मे   उसने   बड़ी  बात  कर ली 
जिसने अपने आप से मुलाकात कर ली
 मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज "दस धर्म सुधा " मे 
सभी मुनि,आर्यिकाओं ,साधु,साध्वियों,श्रावक,श्राविकाओं
को यथोचित नमोस्तु,वन्दामी,मथे वन्दना ,जय जिनेन्द्र,नमस्कार
शुभ प्रात:

Tuesday, 28 February 2012

उत्तम आकिंचन धर्म

           कितना दिया है ? कितना दान दे दिया ? इसका ध्यान आते ही आत्मा मे अहंकार का भाव आता है ! और कितना करना है ?कितना देना है ? यह सोचते ही आत्मा मे पुरुषार्थ का भाव जगता है !
          कहने का तात्पर्य यह है कि तुमने त्याग कर लिया है यह न सोच कर यह सोचें कि अभी कितना करना बाकी है ;तो ही आप आकिंचन धर्म कि ओर बढ़ रहे हैं ! 
         त्याग का भी  त्याग करना यह आकिंचन धर्म है ! 
         तुलसीदास जी के जीवन की एक घटना है .एक बार उनके घर मे एक चोर घुस आया ! तुलसीदास जी उस समय जाग रहे थे ! उन्हें जागता हुआ देख वह भाग खड़ा हुआ ! तुलसीदास उसे भागता हुआ देख चिंतन करने लगे  कि अगर मेरे पास धन न होता तो यह चोर अमावस्या की इस अँधेरी रात मे अपने जीवन को संकट मे डाल कर चोरी करने क्यों आता ! ज्ञानी व्यक्ति हमेशा उपादान को ही दोष देता है ! निमित्त बुद्धि उसकी होती ही नही ! सवेरा होते ही सारा धन पोटली मे बाँध कर नदी मे बहा दिया ! यह कहते हुए कि "न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी"! जब धन ही नही रहेगा तो डाकू कहाँ से और किसलिए आयेंगे ! कहते हैं उस दिन के बाद तुलसीदास मे अपनी कुटिया मे ताला नही लगाया !  
मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज "दस धर्म सुधा " मे

Saturday, 25 February 2012

त्याग

                 त्याग का अर्थ है छोडना ! त्याग हमेशा उसका किया जाता है जो अपने लिए हितकारी नही है ! राग और द्वेष ऐसी ही वैभाविक स्तिथियाँ हैं जो आत्मा को संसार मे रोके रखती हैं ! अत: इनका त्याग अपेक्षित है !
          आचार्य पूज्यपाद के अनुसार संचय  के योग्य ज्ञानादि का दान करना त्याग है ! स्वयं अपना और दूसरे का उपकार करना अनुग्रह है ! ज्ञान देने मे पुण्य का संचय होता है, यह अपना उपकार है और जिसको ज्ञान दिया जाता है ,उसके सम्यक्दर्शन आदि की वृद्धि होती है ! यह पर का उपकार है ! 
*********
           जब हम शरीर को अलग अलग दृष्टि से देखते  हैं ,तो कितना अंतर दीखता है ! जैसे किसी को पैर लगा तो बहुत अनर्थ हो गया ,जब किसी का पैर बढ़ रहा है तो शत्रुता का प्रतीक है ,और उसी व्यक्ति का हाथ बढ़ रहा है तो मैत्री का प्रतीक है ! 
मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज "दस धर्म सुधा " मे

Friday, 24 February 2012

ग्रहण और त्याग

            गर्मी से गर्मी कटती है ,कांटे से काँटा निकलता है ! ग्रहण करते हुए मेरी बुद्धि नही जाती कि मै अधर्म कर रहा हूँ ! यह मेरा स्वभाव नही है ! त्याग करते हुए तेरी बुद्धि जाती है कि त्याग करना आत्मा का स्वभाव नही है ! कुन्दकुन्द स्वामी ने कहा कि त्याग करना आत्मा का स्वभाव नही है ,तो "समयसार" मे यह भी कहा गया है कि ग्रहण करना मेरा स्वभाव नही है ! पूजा करना मेरा स्वभाव नही है तो साथ मे यह भी कहें कि भोजन करना भी स्वाभाव नही है ! पूजा करते  समय यह भाव आ जाता है कि यह सब व्यर्थ है ! क्या रखा है इसमें ? पूजन का द्रव्य एक थाली से दूसरी थाली मे चढाना ,क्या पुण्य का ,धर्म का काम हो सकता है ?लेकिन क्या कभी यह सोचा कि इस थाली का पेट रुपी थाली मे डालना भी धर्म होता है क्या ? तुम जिस थाली मे डालते हो वह सात धातुओं से युक्त दुर्गंधमय है ? और इसमें तुम सुगन्धित खाद्य पदार्थ डालते हो और निकलता है दुर्गन्ध युक्त पदार्थ ? यह अज्ञानता कभी ज्ञान मे आएगी ? पूजा की दोनों थाली गन्दी नही होती ; लेकिन तुम जिस थाली मे सुगन्धित भोजन डालते हो वह थाली दुर्गन्ध युक्त पदार्थ निकालती है ! क्या इसे भी अधर्म कहा कभी ? पूजन दिन मे एक बार किया और भोजन ? दिन मे दस बार  ! आज तथा कथित स्वाध्यायी बंधुओं मे यह परिणाम नही आये कि संकल्पी हिंसा का त्याग कर दूँ ! ऐसा झूठ न बोलूं जिससे किसी की आजीविका चली जाए ! ऐसा कुशील न करूँ !जिस पर मेरा अधिकार नही है ,उस पर नियत खराब नही करूँ ! इतना भी नियम लिया नही और धर्म छोड़ दिया !वह व्यक्ति ऐसा है जिसने कीचड़ लगाना छोड़ा नही और जल का त्याग कर दिया ; पाप रुपी कीचड़ आत्मा पर डालना छोड़ा नही और पुण्य रुपी जल का त्याग कर दिया ! 
मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज "दस धर्म सुधा " मे

Wednesday, 22 February 2012

काल करे सो आज कर

    काल करे सो आज कर ,आज करे सो अब 
    पल मे प्रलय  होएगी ,  बहुरि  करेगा कब
                 सम्यकदृष्टि का लक्षण बता रहा हूँ कि सम्यकदृष्टि ही धर्म कार्यों मे कहता है -काल करे सो आज कर ,आज करे सो अब ! सम्यकदृष्टि कहते हैं कि क्या सोचना ? कल का क्या भरोसा ? मै जिन्दा रहूँगा कि नही ? और आज करे सो अब ! लेकिन आप क्या करते हो ?
   आज   करे   सो  काल  कर  ,काल  करे  सो परसों 
   जल्दी -जल्दी क्या करता है अभी तो जीना बरसों!
                       बस इतना ही अंतर है सम्यकदृष्टि और मिथ्यादृष्टि मे ! सम्यकदृष्टि कहता है जिन्दगी पल भर है ,और मिथ्यादृष्टि कहता है ,जिन्दगी बहुत बड़ी है !सम्यकदृष्टि कहता है कि ध्यान रखना ,मै सम्यकदृष्टि हू ,शुद्ध हूँ ,मुझे आत्मा की प्रतीति हुई है ,मुझे भेद विज्ञान हुआ है ! मै स्वाभिमानी हूँ ! मै दुसरे के निकालने से पहले ही निकल जाता हूँ ! चार लोग मिल कर उठा कर ले अर्थी बनाकर के जला आओगे ! लो मै इस घर को जीते जी ही छोड़कर जाता हूँ 
 मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज "दस धर्म सुधा " मे

Tuesday, 21 February 2012

सूरज और तप

                 सूरज को आपने देखा ? उसी सूरज मे कितने देवता बेठे हैं उन्हें भी तपन होती है क्या ?नही ! इसी प्रकार तपस्या करने वाला भेद विज्ञानी  होता है, जो बाहर तपता है ,कोई हाथ से छू ले तो आग लग जाए ! अंदर तो उसे ऐसा आनंद आता है जैसे सूर्य मे बेठे हुए देवताओं को ! जब जीव बहिर्मुखी होकर तपस्या करेगा तो नियम से उपवास मे भी उसे स्वप्न मे भी भोजन पानी ही दिखाई देगा ! अंतर्मुखी होगा तो उसे कोई मतलब नही उसे दीन  दुनिया से ! 
 मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज "दस धर्म सुधा " मे

Monday, 20 February 2012

शिव और आदिनाथ

 जो छोड़ देता है वह शिव बन जाता है और जिनका
  छुडाया जाता है वह शव बनता है ! कितना फर्क है ?
 शिव और शव मे कितना अंतर है ? एक इ की मात्रा
अंतर है ! यानि लक्ष्मी ! यदि छोड़ दी ,तो शिव बनोगे
और छुडा लिया जाएगा तो शव बन जाओगे !
  मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज "दस धर्म सुधा " मे

शिव और तीर्थंकर आदिनाथ मे काफी  समानताएँ हैं !
शिव का त्रिशूल ,जैन दर्शन मे सम्यक दर्शन ,सम्यक चरित्र
और सम्यक ज्ञान के रूप मे माना जाता है ,दोनों का मोक्ष
कैलाश पर्वत से ही मानते हैं !  आचर्य मानतुंग जो राजा
भोज के समय हुए उन्होंने तीर्थंकर आदिनाथ की भक्ति करते हुए
भक्तामर स्तोत्र मे लिखा भी है :-
बुद्घस्त्वमेव विबुधार्चित-बुध्दि-बोधात्
त्वं शकंरोऽसि भुवन-त्रय-शकंरत्वात्|
धातासि धीर! शिव-मार्ग-विधेर्विधानात्
व्यक्तं त्वमेव भगवन्तुरुषोत्तमोऽसि || |25|

देव अथवा विद्वानों के द्वारा पूजित ज्ञान वाले होने से
आप ही बुद्ध हैं| तीनों लोकों में शान्ति करने के कारण
आप ही शंकर हैं| हे धीर! मोक्षमार्ग की विधि के करने वाले होने से
आप ही ब्रह्मा हैं| और हे स्वामिन्!
आप ही स्पष्ट रुप से मनुष्यों में उत्तम अथवा नारायण हैं |
on Facebook from " Jain Terapanthostu Manglam group "