कपिल नाम का एक ब्राहमण था ! अपने पिता के मित्र इन्द्रदत्त के यहाँ
विद्या अध्ययन के लिए कौशाम्बी से श्रावस्ती आया था ! एक सेठ शालिग्राम के यहाँ
उसके भोजन की व्यवस्था थी ! आया तो था विद्या अध्ययन करने लेकिन सेठ की दासी से
प्रेम करके प्रेम का पाठ पढ़ने लगा ! एक दिन उस दासी ने कहा –मुझे एक उत्सव में
सम्मिलित होना है ! क्या तुम मेरे लिए वस्त्र आभूषण आदि की व्यवस्था नहीं करोगे ?
कपिल ने कहा –मेरे पास धन कहाँ है ,मेरे भोजन तक की व्यवस्था तो सेठ जी के यहाँ है
! मै तुम्हारे लिए वस्त्र आभूषण आदि की व्यवस्था कैसे करूँ ? दासी ने कहा –यहाँ का
राजा बहुत उदार है ,जो कोई भी सुबह सबसे पहले जाकर उसे आशिर्वाद देता है ,वह उसे
दो माशा स्वर्ण देता है ! अत: कल सुबह तुम् सबसे पहले जाकर उसे आशीर्वाद देदो और
दो माशा स्वर्ण प्राप्त कर लो !
चांदनी रात थी ! सुबह हो जाने का समय निकट जानकर आधी रात में ही कपिल
अपने घर से निकल पड़ा और तेजी से दौड़ने लगा ! उसे दौड़ता देख सिपाहियों ने उसे चोर
समझकर पकड़ लिया और अगले दिन राज दरबार में पेश किया ! राजा ने उससे आधी रात में दौड़ने का कारण पूछा
तो उसने सारी बात सच बता दी और यह भी कि कोई और आपको आशीर्वाद न दे जाए ,अन्यथा
मुझे दो माशा स्वर्ण से वंचित रहना पड़ेगा ! राजा उसकी सत्यवादिता से बहुत खुश हुआ
और बोला –ब्राह्मण ! मै तुम्हारी सरलता व सच्चाई पर मुग्ध हूँ ,तुम जो कुछ चाहो
मांग सकते हो !
कपिल बोला –अच्छा है ऐसी बात है तो आप मुझे सोचने को कुछ समय दें ! सोचते
हुए कपिल दो माशा से सौ स्वर्ण मुद्रा , सौ से हजार ,हजार और करोड दस करोड स्वर्ण
मुद्राओं तक पहुँच गया ! वह इसी उधेड़बुन में था कि राजा ने उसे कहा जो माँगना
चाह्ते हो जल्दी से मांग लो ब्राहमण देवता !
राजा के मुहँ से ब्राह्मण सुनते ही उस के भीतर का ब्रह्म जाग गया !
उसने सोचा धिक्कार है मुझे ! देख ली मैंने लोभ की लीला ! मै तो मात्र दो माशा
स्वर्ण की चाह लेकर आया था लेकिन लाभ को देखते ही मेरे मुहँ में पानी आ गया और दस
करोड स्वर्ण मुद्राओं तक पहुँच गया ! धन की लिप्सा अंतहीन है ,इससे कभी तृप्ति
नहीं मिल सकती ! कपिल चिंतन की गहराई में डूब गया !
कपिल ने कहा –मुझे कुछ नहीं चाहिये ! मुझे जो चाहिये था वो मिल गया !
राजा ने आश्चर्यचकित हो कर पूछा –मैंने तो आप को कुछ नहीं दिया फिर आपको कैसे सब
कुछ मिल गया ! कपिल ने अपनी सारी चिंतन की कहानी साफ़ साफ़ कह दी !
मुझे तो परिग्रह का परित्याग करके लोभ पर विजय प्राप्त करनी है ,जिससे
मै पूर्ण तृप्ति को प्राप्त कर परम सुख का अनुभव कर सकूँ ! ऐसा कह कर कपिल वहाँ से
चल पड़ा और स्वयंबुद्ध हो कर मुनि जीवन अंगीकार कर लिया ! उसे छ: महीने में केवल
ज्ञान की प्राप्ति हो गयी !
मुनिश्री 108 प्रमाण
सागर जी “धर्म जीवन का आधार” से संपादित अंश
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