मेरा अपना इसमें कुछ भी नहीं .........

जो भी कुछ यहाँ लिखा है जिनेन्द्र देव और जैन तीर्थंकरों की वाणी है !

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Tuesday 10 April 2012

निन्यानवे का चक्कर

          एक सेठ के यहाँ कारों का व्यवसाय था जिसके चक्कर मे वह  बड़ा व्यस्त रहता था !सुबह का समय हो या शाम उसे अपने व अपने परिवार के लिए कभी समय नही था ! देर रात्रि मे ही वह बिस्तर पर जाता और थका- मांदा पड़कर सो जाता और सुबह को फिर वही क्रम चलना शुरू हो जाता था ! 
           एक  दिन उसकी पत्नी ने उसे कहा कि आप क्यों इतना व्यस्त रहते हैं कि इतना सब कुछ होते हुए भी आपके पास घर परिवार बच्चों व मित्रों के लिए कोई समय नही ! हर समय व्यवसाय की उलझनों मे उलझे रहते हैं ! हमसे तो अच्छा हमारा यह पडोसी है जो मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालता है ,सुबह को 9 बजे घर से निकलता है व शाम को 6 बजे तक वापस घर आ जाता है ,उसके बाद भोजन आदि से निवृत होकर पति -पत्नी दोनों वीणा व सितार बजाते हुए भगवत भक्ति मे लीन हो जाते हैं व रात्रि को दस बजे तक भगवन के भजन मे मग्न हो रहते हैं !मैंने भी काफी बार उनका भजन कीर्तन सुना है व आनन्द का अनुभव किया है !
सेठ से उसका यह सुख देखा नही गया ,फिर क्या था ! किसी तरीके से नौकर के हाथों एक कम सौ रूपये यानि निन्यानवे रूपये की भरी थैली उसके यहाँ रखवा दी ! वह रूपये देख कर बड़ा खुश हुआ व उसने उन्हें भगवन का प्रशाद समझ कर  अपने पास रख लिया ! उसने गिना तो उन्हें निन्यानवे रूपये पाया और सौ करने की चाह मे अब वह सब भूल गया ! एक दो घंटे घर देरी से आने लगा ,एक रुपया रोज कमाता था और उसी मे मग्न हो कर अपना गुजारा करता था लेकिन अब उसे उन रुपयों को सौ मे बदलना था ! भगवन का भजन कीर्तन अब उसके लिए स्वप्न की बात रह गयी ! निन्यानवे के फेर मे जो उलझ गया था !

           क्या इन्सान की जिन्दगी आज यही होकर नही रह गयी ! घर परिवार के लिए समय नही ! मित्रों के लिए समय नही !और तो और भगवन भक्ति के लिए भी कुछ मिनटों का समय नही ! 

         शिक्षा ये है कि मनुष्य से क्यों दुसरे का सुख भी नही देखा जाता !  क्यों इन्सान आज इतना स्वार्थी होता जा रहा है कि उसे दुसरे को दुखी करने के लिए चाहे अपना नुक्सान भी करना पड़े तो वह तैयार है !

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