मेरा अपना इसमें कुछ भी नहीं .........

जो भी कुछ यहाँ लिखा है जिनेन्द्र देव और जैन तीर्थंकरों की वाणी है !

जैन साधुओं व साध्वियों के प्रवचन हैं !!

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Sunday, 1 April 2012

संगत की रंगत

एक समय एक राजा साहब की महफ़िल मे गाने बजाने के लिए एक वेश्या गयी !  उसके साथ एक पिंजड़े मे उसका तोता भी था ! उसने राजा के दरबार मे आते ही गालियाँ देनी शुरू कर दी ! राजा बहुत क्रोधित हुआ ! वह बोला -तोते के तुरंत मृत्यु दण्ड दिया जाए ! 
तोते  ने बड़ी चालाकी से कहा -हुजूर ,मुझे मेरे भाई से मिलकर अपनी अंतिम इच्छा कहनी है उसके बाद मुझे मारा जाए ,मुझे कोई आपत्ति नही ! मेरा भाई अमुक पण्डित के पास रहता हैं ,उसे कृपया बुलाया जाए ! राजा के हुक्म से उसे पण्डित के साथ  बुलाया गया ! आते ही तोते ने अच्छी अच्छी गाथा शुरू कर दी ,श्लोक सुनाने शुरू कर दिये ! राजा बड़े खुश हुए ! उन्होंने उस तोते के लिए यथोचित  भोजन देने को कहा !  पहले वाला तोता बोला - महाराज ! इसे भोजन और मुझे मृत्यु दण्ड ऐसा क्यों ? जबकि हम एक ही माता के पुत्र हैं ,किन्तु मै  वेश्या के यहाँ  पला बढ़ा,इसीलिए गालियाँ देना सीख गया  और ये पण्डित के यहाँ पला होने से अच्छे -अच्छे श्लोक सीख गया ! 
कहने  का आशय है कि मनुष्य के हाथ मे तो सत् संगति का धारण करना हैं,मनुष्य   भी अनुकरणशील होता है ,उसे जैसी संगत मिलती है वैसा बन जाया करता है ! चांडाल के लड़के को भी सत्संग मिल जाए और सत्संग मे पडकर  अहिंसा को स्थान दे ,परोपकार की तरफ झुके तो वह भी घृणा का पात्र न होकर आदर का पात्र होता है ! ऐसा हमारे महापुरुष कह गए हैं !
मतलब यह है कि जाति से इन्सान बड़ा या छोटा नही होता है ! कोई  किसी का बुरा या भला करने वाला नही है
जो गुणों को ग्रहण करता है वह गुणवान बन जाता है !

Saturday, 31 March 2012

प्रभावना अंग

         अज्ञान रुपी अन्धकार के प्रसार को यथा सम्भव उपायों के द्वारा दूर करके जिन शासन के महात्मय को जगत मे प्रकाशित करना प्रभावना अंग है !
         जिस किसी ने प्रथ्वी मंडल के सभी राजाओं को अपना आज्ञाकारी बना लिया है ,जिसके बाहुबल के आगे टिकने मे कोई समर्थ न हो ,वह महाबली भी एक अबला के चंगुल मे फंसकर पानी पानी हो जाता है ! बड़े बड़े शूरवीरों के लोह्मयी वाणों से जिसका बख्तर नही भिद पाता ,वही बख्तर अबला के कटाक्ष वाणों से चूर-चूर होता देखा गया है !
         मतलब यह कि दुनिया के लोगों को वश मे जरूर किया ,परन्तु अपने आपको वश मे नही रखा ! अपने मन को काबू मे नही रखा ! इसीलिए  दुनिया को जीतने के लिए काम को जीतना जरूरी होता है ,जिसने काम को जीत किया वस्तुत: वही जिन है ! सर्व विजेता कहलाने का अधिकारी है !
       जो हर्ष विषादादि सभी तरह के मानसिक  विकारों से सर्वथा दूर हो वही जिन है  और उन्ही जिन भगवान का यह उपदेश है कि हरेक मनुष्य को अपने मन व इन्द्रियों को काबू मे करें !
समझदार व्यक्ति को चाहिये कि अपने मन मे दुसरे की बुरी आदत से हटाकर सन्मार्ग पर लगाने का विचार करें ! किस उपाय से लोग ठीक राह पर आएं ये सोचें !
      मीठे वचनों से उन्हें समझाएं और खुद अपनी ऐसी प्रवृत्ति बनाएँ जिसे आदर्श मानकर लोग उनका अनुसरण करने लग जाएँ ! सबसे पहली बात तो ये है कि हम जिस राह पर लोगों को चलना और देखना पसन्द करते हैं उस पर खुद चलें ! कहें कम और करें अधिक तो लोग अवश्य उसका अनुसरण करेंगें और यही सच्ची प्रभावना होगी !
मूल रचना  :    "रत्न करंड  श्रावकाचार "मानव धर्म  आचार्य श्री समन्तभद्र स्वामी 
 हिन्दी व पद अनुवाद : आचार्य श्री ज्ञान सागर जी व आचार्य श्री विद्या सागर जी   

Friday, 30 March 2012

वात्सल्य अंग

     अपने समाज के प्रति,छल कपट रहित,सदभाव सहित यथोचित स्नेहमयी प्रवृत्ति को वात्सल्य अंग कहते हैं ! 
       सभी  के साथ सच्चे दिल से प्रेम करना और समुचित व्यवहार के द्वारा यह दिखलाते रहना कि हम आपके ही हैं ,बस इसी का नाम वात्सल्य अंग है ! किसी को भी वश मे करने का उपाय है तो परस्पर का प्रेम है ! मजबूत से मजबूत लोहे के सांकल को मनुष्य तोड़ सकता है ,परन्तु प्रेम के बंधन को नही तोड़ सकता ! देखो ,जो भौरा कठिन से कठिन काठ मे  भी छेद कर डालता है ,वह कमल के अंदर पड़ा हुआ अपने प्राण तक दे देता है ,इसमें क्या कारण है ? है तो यही कि उसका उस से प्रेम है ! इसीलिए उसे जरा भी तकलीफ न देकर अपने प्राण तक दे देता है !
       "पाँव पिचानि मोचडी ,नयन पिछाणी नेह " अर्थात अन्धकार मे भी हम अपनी जूतियों को अपने पैरों मे पहनकर पहचान लेते हैं ! अपनी जूतियाँ अपने पैरों मे जैसे ठीक बैठती हैं ,वैसी दूसरों की नही बैठती ! उसी प्रकार सामने वाले के प्रति हमारा प्रेम है कि नही ये हम उसके नेत्रों की तरफ गौर से देखकर पहचान लेते हैं ,जां सकते हैं ! किसी भी को दुखों दरिद्र व्यक्ति को देखकर उसकी मदद करने मे जी जान से जुट जाता है ,यही वात्सल्य अंग है !
       मतलब  यह है कि भला आदमी दुनिया को अपनाते हुए अपने से प्रतिकूल चलने वाले को भी रास्ता सुझाते हुए प्रसन्नता पूर्वक चलता है और विश्व भर मे अपनी छवि बनाता है !
मूल रचना  :    "रत्न करंड  श्रावकाचार "मानव धर्म  आचार्य श्री समन्तभद्र स्वामी 
 हिन्दी व पद अनुवाद : आचार्य श्री ज्ञान सागर जी व आचार्य श्री विद्या सागर जी   

Thursday, 29 March 2012

स्थितिकरण अंग

          सम्यक् दर्शन अथवा सम्यक चरित्र से चलायमान होने वाले लोगों का धर्म वत्सल जनों के द्वारा पुन: अवस्थापन करने को प्राज्ञ पुरुष स्थितिकरण अंग कहते हैं !
        इस  सँसार मे कोई भी व्यक्ति अपना कार्य दुसरे की सहायता के बिना नही कर सकता ! इसीलिए  हम भी दूसरों की मदद करना सीखें ! कहीं ऐसा न  हो  कि आजीविका की कमी से या रोग से या और किसी कारण से घबराकर कोई भई बहन अपने सदाचार या समुचित विशवास से भ्रष्ट होकर पतित हो जाए ! बेसहारा को सहारा देकर थामना और जो ठोकर खा कर गिर पड़ा हो उसे उठाकर फिर से सावधान करना ही होशियारी है न कि उसे कोसना ! भूल होना कोई बड़ी बात नही है ,भूलना मनुष्य का प्राकर्तिक धर्म है और हम जानते हैं तो प्रेम पूर्वक मीठे शब्दों मे उसे समझाएं ! रास्ते पर लाएं ! वरना हमारी समझदारी किस की ! साथी का साथ वही जो आपत्ति के समय साथ आये ,काम आये !
मूल रचना  :    "रत्न करंड  श्रावकाचार "मानव धर्म  आचार्य श्री समन्तभद्र स्वामी 
 हिन्दी व पद अनुवाद : आचार्य श्री ज्ञान सागर जी व आचार्य श्री विद्या सागर जी   

Wednesday, 28 March 2012

उपगूहन अंग

        स्वयं शुद्ध निर्दोष सन्मार्ग को बाल (अज्ञानी) और अशक्त जनों के आश्रय से होने वाली निंदा को जो दूर करते हैं उसे ज्ञानी जन उपगूहन अंग कहते हैं !
      बुरे काम की ओर मनुष्य की सहज भाव से प्रवृत्ति होती है ! समझाने पर भी भली बात की ओर झुकना इसके लिए कठिन होता है प्रथम तो बहली बात को सुनना भी कोई नही पसन्द करता ,अगर किसी ने सुन भी लियातो फिर उस पर चलना वह अपने लिए उतना ही कठिन समझता है जितना सांप के लिए सीधा चलना ! अगर कहीं किसी ने स्वीकार कर भी लिया तो उसे अन्त तक उस रूप मे निभाना बहुत ही कठिन होता है ! अगर कोई अपने किये हुए संकल्प को निभाना भी चाहता है ,तो दुनियादारी के लोग उसे स्पर्धा करके अपने संकल्प पर डटे रहने से लाचार बनाने की चेष्टा करते हैं ,उसे हर तरफ से बाध्य किया करते हैं ताकि वह अपने कर्तव्य से हट जाए ! समझदार आदमी किसी की बुराई करना जानता ही नही ,वह अपने आपकी अपेक्षा सभी को बहुत अच्छा मानता है ! वह हर समय अपने अवगुणों को देखा करता है ,दूसरे के अवगुणों की तरफ उसकी निगाह जाती ही नही ! दूसरे मे कोई गुण हों तो वह ग्रहण करने को लालायित रहता है ! दूसरे की बुराई को सुनना भी नही चाहता ,वह मानता है कि दूसरे की बुराई सुनने वाला ही बुरा होता है !अगर किसी के सामने किसी की बुराई का प्रसंग आता भी है तो वह बड़ी चतुराई से ताल जाता है ! इसी प्रकार सज्जन को चाहिए कि दूसरे के अवगुणों मे से भी गुण ढूंढ ले ! समालोचकों की दृष्टि मे बिलकुल न खटके ताकि हर व्यक्ति सहज सन्मार्ग पर चलने लगे !
मूल रचना  :    "रत्न करंड  श्रावकाचार "मानव धर्म  आचार्य श्री समन्तभद्र स्वामी 
 हिन्दी व पद अनुवाद : आचार्य श्री ज्ञान सागर जी व आचार्य श्री विद्या सागर जी   

Tuesday, 27 March 2012

अमुढदृष्टि

         दुःख के कारणभुत कुमार्ग मे और कुमार्ग पर स्थित व्यक्ति मे मन से सहमति न देना ,काय से सराहना नही करना ,वचन से प्रशंसा नही करना  अमूढदृष्टि अंग कहा जाता है !
        दुनिया  के बहुतायत  मनुष्य अपना पेट पालना चाह्ते हैं ,अपनी रोटी को ताव देना चाह्ते हैं ,दूसरों से इर्ष्या द्वेष रखते हैं ! मनुष्य का असर सब प्राणियों पर पड़ता है ! प्राणियों पर ही नही ,बल्कि भूतल की समस्त चीजों पर मनुष्य की भावना का प्रभाव दिखाई पड़ता है क्योंकि मनुष्य सबका मुखिया है ! मनुष्य का दिल जब संकीर्ण होता है वह औरों की भलाई से मुहं मोड लेता है ,मेघ भी समय पर नही बरसते ,वृक्षों पर फल नही आते ,उन्हें हवा मार जाती है या कीड़े मकोड़े लग जाते हैं और वसुंधरा पर फसल पैदा नही होती ! सब दुखी हो जाते हैं ! मनुष्य अगर अपनी भावना बदल दे ,परोपकार मय बना ले तो फिर दुनिया की चीजें भी उसी रूप परिणत हो जाती हैं ! हम रामायण मे सुना करते हैं राम चन्द्र जहाँ भी जाते थे वहाँ सूखे घास हरे हो जाते थे ,सूखे तालाब पानी से भर जाते थे ! इसका कारण यही था कि उनके अन्तरंग मे सबके प्रति परोपकार की भावना प्रबल  थी ! सन्मार्ग को उपादेय मान कर अपने आपकी भान्ति औरों का भी उपकार करे ,सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दें ! एतावता सन्मार्ग पर चलते चलते कोई व्यक्ति स्खलित भी हो जाए तो सयाने आदमी उसे प्रयास करके फिर सन्मार्ग पर लाते हैं !
मूल रचना  :    "रत्न करंड  श्रावकाचार "मानव धर्म  आचार्य श्री समन्तभद्र स्वामी 
 हिन्दी व पद अनुवाद : आचार्य श्री ज्ञान सागर जी व आचार्य श्री विद्या सागर जी    

Monday, 26 March 2012

निर्विचिकित्सा अंग

              स्वभाव से ही अपवित्र किन्तु रत्नत्रय को धारण करने से पवित्र ऐसे धार्मिक पुरुषों के मलिन शरीर को देखकर भी उसमे ग्लानि नही करना और उसके गुणों मे प्रीति करना निर्विचिक्त्सा अंग कहलाता है !
            सभी मनुष्यों का शरीर एक से ही हाड ,मांस, मज्जा ,लहू से बना है मलमूत्र आदि का कुण्ड है ! इसमें एक के शरीर को भला व दूसरे को बुरा मानना भूल भरा है ! इस शरीर मे जितनी भी चीजे हैं कोई सारभूत नही हैं अगर इसमें सार है तो यह कि इसको पाकर तपश्चरण किया जाए ,इसे परोपकार मे लगा दिया जाए और ज्ञान संपादन किया जाए तभी यह आत्मा परम पावन पूनीत बनती है और जगत पूज्य बन सकती है ! हम देखते हैं कि रिद्धि धारी मुनियों के स्पर्श से यह भूमि परम पवित्र बन जाती है ! रिद्धि धारी मुनियों के शरीर को छूकर आई हुई वायु के स्पर्श से ही बड़े बड़े रोग दूर हो जाते हैं ! यह सब कारामात तपस्या की है !जो व्यक्ति जितना सदाचारी हो, जितना ज्ञानवान हो जितना विशवास पात्र हो ,वह उतना ही आदर पाता है ! इसीलिए जिसमे भी यह गुण हैं ,चाहे वह शरीर से गोरा हो ,काला हो रोगी हो या निरोगी हो ,लूला हो या लंगड़ा हो ,कैसा भी क्यों न हो ,बिना किसी घृणा के उसकी परिचर्या करना ही निर्विचिक्त्सा अंग का धारण करना कहलाता है  ! ऐसा करने से सर्व साधारण लोग भी सदाचरण आदि गुणों की तरफ आकर्षित होंगे !
              सँसार की सारी चीजें अपने -अपने स्वभाव के अनुसार परिणमन करती हैं ! इसमें कौन भली हैं ,कौन बुरी है ,कुछ नही कहा जा सकता ! अगर कोई बुरी चीज है या घृणा की जगह है तो मेरे सरीखे मनुष्य की आत्मा है जो कि अपने स्वभाव को (भली आदतों को ) भूल कर बुरी आदतों को अपना रहा है ! यह सोचकर घृणा करता है तो सिर्फ पापों से और किसी को  नही !
मूल रचना  :    "रत्न करंड  श्रावकाचार "मानव धर्म  आचार्य श्री समन्तभद्र स्वामी 
 हिन्दी व पद अनुवाद : आचार्य श्री ज्ञान सागर जी व आचार्य श्री विद्या सागर जी