मेरा अपना इसमें कुछ भी नहीं .........

जो भी कुछ यहाँ लिखा है जिनेन्द्र देव और जैन तीर्थंकरों की वाणी है !

जैन साधुओं व साध्वियों के प्रवचन हैं !!

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कोई कापीराइट नहीं ..........

Saturday, 16 February 2013

विवेक की आँख


मित्रों जय जिनेन्द्र ......शुभ प्रात: प्रणाम
आँखों का मनुष्य के जीवन मे बहुत अधिक महत्त्व है ! आँखों के बिना मनुष्य की दुनिया बहुत छोटी हो जाती है ! कहने का तात्पर्य है कि दुनिया तो उतनी होती है बस आँखों के बगैर मनुष्य के लिए दुनिया वैसी नहीं रहती जैसी सामान्य व्यक्ति के लिए होती है !
विवेक एक आँख है और विवेकी व्यक्ति के संपर्क मे रहना दूसरी आँख है ! जिसके पास न विवेक की आँख है और न विवेक संपन्न व्यक्ति के संपर्क मे रहने की आँख है , वह आँखें होते हुए भी अंधा होता है !
जिसके पास विवेक की आँख होती है उसके जीवन मे पथ सुगम  हो जाता है !कई बार बाहर की आँख न होने पर भी विवेक की आँख व्यक्ति को बहुत आगे ले जाती है , सही दिशा व दशा का ज्ञान करा देती है !
आध्यात्म की दृष्टि से देखा जाए तो चक्षु इन्द्रिय का संयम विशेष महत्व रखता है ! मनभावन रूप को देख कर उसमे आसक्त हो जाना और राग के भाव पैदा हो जाना और अन्य को देखकर द्वेष के भाव या खेद के भावों का आना दोनों ही  स्थितियां मानव जीवन मे घातक सिद्ध हो सकती हैं !
पतंगा प्रकाश के रूप पर आसक्त हो जाता है और अपना जीवन नाश कर बैठता है ! इसी तरह मानव मन जब अन्य स्त्री या पुरुष के रूप को देख कर जब आसक्त हो जाता है तब व्यक्ति पतन के गहरे गढ्ढे मे गिर जाता है और उसका जीवन नष्ट हो जाता है !

Friday, 15 February 2013

दशा और दिशा


मित्रों जय जिनेन्द्र ......शुभ प्रात: प्रणाम
दुःख है , इसे स्वीकार करो  और वह दुःख  दूर किया जा सकता है ,इस पर भी विश्वास रखो ! तुम अपने जीवन मे ही मुक्ति दशा को प्राप्त कर सकते हो ,आवश्यकता है बस दिशा को बदलने की !

Wednesday, 13 February 2013

बंधन को समझो और तोडो !


बंधन को समझो और तोडो ! तुम्हारी अनन्त शक्ति के सामने बंधन की क्या है हस्ती ! बंधन का करता आत्मा ही बंधन को तोड़ने वाली है! इसके लिए अपने स्वरुप को, अपनी शक्ति को जगाकर प्रयत्न  करने की आवश्यकता है ,बस मुक्ति तैयार है !
साध्य तो मुक्ति है लेकिन साधन ? साधन के विषय मे अलग अलग मत हो सकते हैं ,किसी ने कहा ज्ञान मुक्ति का साधन है किसी ने कहा भक्ति ही एकमात्र साधन है और किसी का जोर सेवा पर रहा ,कर्म पर बल दिया
जैन दर्शन का कथन यह है कि तीनों का समन्वय ही मुक्ति का साधन है!  अज्ञान और वासना के घने जंगल को जलाकर भस्म करने वाला दावानल सम्यक ज्ञान है ! ज्ञान का अर्थ यहाँ पुस्तकीय ज्ञान से नहीं है बल्कि अपनी आत्मा के स्वरुप का ज्ञान से है ! परन्तु यह सम्यक ज्ञान उसी के जीवन मे प्राप्त हो सकता है जिसे सम्यक दर्शन की एक किरण प्राप्त हुई हो ! भले ही उस किरण का प्रकाश कितना ही मंद क्यों न हो !
सम्यक दर्शन का प्राप्त होना सम्यक चरित्र के बिना संभव नहीं ! इसीलिए जैन दर्शन सम्यक दर्शन ,सम्यक ज्ञान व सम्यक चरित्र के समन्वय को ही मोक्ष मार्ग मानता है !

good morning


Saturday, 9 February 2013

प्रथम सूर्य हैं आदि जिनेश्वर


मित्रों जय जिनेन्द्र ......शुभ प्रात: प्रणाम
वर्तमान काल  के युग दृष्टा थे प्रभु ऋषभदेव ! अयोध्या के राजा नाभिराज के पुत्र ऋषभ अपने पिता की मृत्यु के बाद राज सिंहासन पर बैठे जैन पुराणों के अनुसार अन्तिम कुलकर राजा नाभिराय के पुत्र ऋषभदेव हुये जो कि महान प्रतापी सम्राट और जैन धर्म के प्रथम तीथर्कंर हुए। ऋषभदेव के अन्य नाम ऋषभनाथ, आदिनाथ, वृषभनाथ भी है। भगवान ऋषभदेव का विवाह यशस्वती (नन्दा) और सुनन्दा से हुआ। उनके पुत्रों मे  भरत सबसे बड़े एवं प्रथम चक्रवर्ती सम्राट हुए जिनके नाम पर इस देश का नाम भारत पडा। दुसरे पुत्र बाहुबली भी एक महान राजा एवं कामदेव पद से बिभूषित थे। इनके आलावा ऋषभदेव के वृषभसेन, अनन्तविजय, अनन्तवीर्य, अच्युत, वीर, वरवीर आदि ९९ पुत्र तथा ब्राम्ही और सुन्दरी नामक दो पुत्रियां भी हुई, जिनको ऋषभदेव ने सर्वप्रथम युग के आरम्भ में क्रमश: लिपिविद्या [अक्षरविद्या]और अंकविद्या का ज्ञान दिया।
उस समय का मानव कुछ नहीं जानता था ! प्रकृति पर निर्भर था ! मिल गये कंद - मूल तो खा लिए ,नहीं मिले तो पड़ा है निष्क्रिय !इतिहास कहता है ऋषभ देव के समय भोग भूमि की परम्परा थी ! सब प्रकृति पर निर्भर थे !न नव निर्माण की दृष्टि थी न जीवन के विकास की ! निष्क्रिय मानव को सक्रिय बनाकर जीवन जीने की कला सिखाई ऋषभदेव ने !
धर्म तीर्थंकर बनने से पूर्व वह बने कर्म तीर्थंकर ! और उन्होंने कृषि, शिल्प, असि (सैन्य शक्ति ), मसि (परिश्रम), वाणिज्य और विद्या इन छह आजीविका के साधनों की विशेष रूप से व्यवस्था की तथा देश व नगरों एवं वर्ण व जातियों आदि का सुविभाजन किया।
ऐसे आदि प्रभु के मोक्ष कल्याणक  दिवस पर शत –शत नमन !

Friday, 8 February 2013

जय जिनेन्द्र



जय जिनेन्द्र बंधुओं ....शुभ प्रात: प्रणाम
धन ,बल व विद्या जब तक पच नहीं जाते तब तक मनुष्य अहंकार के रोग से ग्रस्त रहता है ! किन्तु जब वे हजम हो जाते हैं तो वे ही मनुष्य को विनम्र बना देते हैं !